December 28, 2020

स्वामी विवेकानंद की जीवनी | Swami Vivekananda Biography In Hindi

स्वामी विवेकानंद की जीवनी  

प्राचीन काल से भारत ने दुनिया को बहुत सारे संत और आध्यात्मिक नेता प्रदान किए हैं। जिनमे स्वामी विवेकानन्द का नाम भी शामिल है। जिन्होंने अपनी दृष्टि और ज्ञान से दुनिया को मंत्रमुग्ध कर दिया है।

उनमें से सबसे प्रसिद्ध आध्यात्मिक नेता, स्वामी विवेकानंद हैं। जो दुनिया में हिंदुत्व के सकारात्मक पक्ष को फैलाने और हिंदुत्व को जीवन के एक मार्ग के रूप में पेश करने के लिए जाने जाते हैं।

आज हम आपको इस आर्टिकल के माध्यम से स्वामी विवेकानंद के जीवन से जुड़ी  सारी बातो के बारे में जिक्र करेंगे। स्वामी विवेकानंद के जीवन से जुड़े कई विचार भी इस आर्टिकल के माध्यम से आप तक पहुचायेंगे।

स्वामी विवेकानंद की प्रारंभिक जीवन और शिक्षा

स्वामी विवेकानंद, जो अपने प्रारंभिक जीवन में नरेंद्र नाथ दत्ता के नाम से जाने जाते थे। उनका जन्म  12 जनवरी 1863 को कोलकाता में एक संपन्न परिवार में हुआ था। उनके पिता विश्वनाथ दत्त कई विषयों में एक सफल वकील थे और उनकी माँ भुवनेश्वरी  गहरी भक्ति मजबूत चरित्र और अन्य गुणों से संपन्न थीं।

वह बचपन से ही असाधारण थे और संगीत, जिमनास्टिक और पढ़ाई में उत्कृष्ट थे। पढ़ाई में स्वामी विवेकानंद सुरुआत से भी बहुत होशियार थे। वे हमेशा अपनी पढ़ाई को प्रैक्टिकल के तौर पर समझते थे।

उन्होंने अपनी पढ़ाई के साथ-साथ पहले मेट्रोपॉलिटन संस्थान और बाद में कलकत्ता के प्रेसीडेंसी कॉलेज में उत्कृष्ट प्रदर्शन किया। जब उन्होंने कॉलेज से स्नातक किया, तब तक उन्होंने विभिन्न विषयों का एक विशाल ज्ञान प्राप्त कर लिया था।

उन्होंने एक ओर भगवद गीता और उपनिषदों जैसे हिंदू धर्मग्रंथों का अध्ययन किया, वहीं दूसरी ओर उन्होंने डेविड ह्यूम, जोहान गोटलिब फिच्ते और हर्बर्ट स्पायर द्वारा पश्चिमी दर्शन, इतिहास और आध्यात्मिकता का भी अध्ययन किया।

स्वामी विवेकानंद की आध्यात्मिक जागृति

1884 में, नरेंद्रनाथ ने अपने पिता की मृत्यु के कारण काफी आर्थिक तंगी का सामना किया। क्योंकि उन्हें अपनी माँ और छोटे भाई-बहनों का आर्थिक रूप से समर्थन करना था। उन्होंने रामकृष्ण से अपने परिवार के आर्थिक कल्याण के लिए देवी से प्रार्थना करने के लिए कहा।

रामकृष्ण के सुझाव पर वह खुद मंदिर में प्रार्थना करने गए। लेकिन एक बार जब उन्होंने देवी का सामना किया। तो वह धन माँगने में सक्षम नहीं थे, इसके बजाय उन्होंने ‘विवेक’ (विवेक) और ‘बैराग्य’ (समावेश) का आशीर्वाद मांगा। उस दिन नरेंद्रनाथ के पूर्ण आध्यात्मिक जागरण को चिह्नित किया गया और वह आध्यात्मिक पथ पर अग्रसर हुए।

विश्व धर्म संसद में व्याख्यान

अपने दौरे के दौरान, उन्हें 1893 में शिकागो, अमेरिका में आयोजित होने वाले विश्व धर्म संसद के बारे में पता चला। वह भारत, हिंदू धर्म और उनके गुरु श्री रामकृष्ण के दर्शन का प्रतिनिधित्व करने के लिए बैठक में भाग लेने के लिए उत्सुक थे। शिकागो जाने के रास्ते में उन्हें बहुत कठिन कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। लेकिन उनकी आत्माएं हमेशा की तरह अदम्य रहीं।

11 सितंबर 1893 को, जब समय आया, उन्होंने मंच लिया और अपनी प्रारंभिक पंक्ति “मेरे भाइयों और अमेरिका की बहनों” के साथ सभी को चौंका दिया।

उन्होंने शुरुआती वाक्यांश के लिए दर्शकों से एक स्थायी ओवेशन प्राप्त किया। उन्होंने हिंदू धर्म को विश्व धर्मों के मानचित्र पर रखकर वेदांत के सिद्धांतों और उनके आध्यात्मिक महत्व का वर्णन किया।

उन्होंने अमेरिका में अगले ढाई साल बिताए और 1894 में न्यूयॉर्क के वेदांत सोसाइटी की स्थापना की। उन्होंने पश्चिमी दुनिया को वेदांत और हिंदू अध्यात्मवाद के सिद्धांतों का प्रचार करने के लिए यूनाइटेड किंगडम की यात्रा भी की।

शिक्षण और रामकृष्ण मिशन

विवेकानंद 1897 में भारत लौट आए। देश भर में व्याख्यान देने के बाद वे कलकत्ता पहुँचे और 1 मई, 1897 को कलकत्ता के पास बेलूर मठ में रामकृष्ण मिशन की स्थापना की। रामकृष्ण मिशन के लक्ष्य कर्म योग के आदर्शों पर आधारित थे और इसका प्राथमिक उद्देश्य देश की गरीब और संकटग्रस्त आबादी की सेवा करना था।

रामकृष्ण मिशन ने स्कूल, कोलाज और अस्पतालों की स्थापना और संचालन, सम्मेलन, सेमिनार और कार्यशालाओं के माध्यम से वेदांत के व्यावहारिक सिद्धांतों का प्रचार, देश भर में राहत और पुनर्वास कार्य शुरू करने जैसे विभिन्न सामाजिक कार्य किए।

स्वामी विवेकानंद की मृत्यु

स्वामी विवेकानंद ने भविष्यवाणी की थी कि वे चालीस साल की उम्र तक नहीं रहेंगे। 4 जुलाई, 1902 को, उन्होंने बेलूर मठ में अपने दिनों के काम के बारे में जाना, विद्यार्थियों को संस्कृत व्याकरण पढ़ाया।

वह शाम को अपने कमरे में सेवानिवृत्त हो गया और लगभग 9 बजे ध्यान के दौरान उसकी मृत्यु हो गई। कहा जाता है कि उसे ‘महासमाधि’ प्राप्त हुई और महान संत का गंगा नदी के तट पर अंतिम संस्कार किया गया।

December 16, 2020

National Day Math राष्ट्रीय गणित दिवस

*** National Day Math*** 

***राष्ट्रीय गणित दिवस 2020 ***

प्रत्येक वर्ष की भांति सन 2020 में भी राष्ट्रीय गणित दिवस के दिन गणित की  प्रतियोगिता का आयोजन  online ऑनलाइन लायक सर द्वारा किया जा रहा है। 

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राष्ट्रीय गणित दिवस 2020 पूरे देश में 22 दिसंबर, मंगलवार को मनाया जायेगा।

नियम ओ शर्ते निम्न है

# पेपर paper  मिडिल माध्यमिक  स्तर एवं high स्कूल स्तर दो स्तर का होगा 

# पेपर दोनों भाषाओं हिंदी hindi इंग्लिश english में होगा

# पेपर में प्रश्नों की संख्या 20 बहुविकल्पी प्रकार के होंगे

#परीक्षा का 22 दिसम्बर 2020 समय 10 बजे सुबह से 11 बजे तक एक घण्टे तक लिंक ओपन open रहेगी

 # अधिक जानकारी अपने शिक्षक से प्राप्त करे 

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online रजिस्ट्रेशन निम्न वत है।

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December 01, 2020

रावण

रावण...
     रावण को भाई के रूप में वही पसन्द कर सकती है जिसका चरित्र सूर्पनखा जैसा हो। जो वन-वन घूम कर दूसरी स्त्रियों का पति चुराती हो। या जो किसी सुन्दर स्त्री को देखे तो अपने भाई को उसका हरण करने के लिए प्रेरित करे। ऐसी स्त्रियाँ कभी आदर्श नहीं हो सकतीं।
     रावण को भाई के रूप में वही पुरुष पसन्द करता है जिसका चरित्र कुंभकर्ण जैसा हो। जो सज्जन होने के बावजूद भाई के कुकर्मों के समय आंख बंद कर ले। ऐसे लोग कभी अनुकरणीय नहीं हो सकते।
     रावण को पति के रूप में वही स्त्री पसन्द कर सकती है, जो अपने पति को हजार टुकड़ों में बंटते देख सकती हो। जो देख सकती हो कि उसका पति यक्ष, गन्धर्व, नाग, असुर, राक्षस, यवन सभी जाति की स्त्रियों का हरण करे और बलपूर्वक अपनी पत्नी बना कर रखे। जो सहन कर सकती हो कि उसका पति उसकी किसी भी बात को न माने... वह गिड़गिड़ाती रहे, पर उसका पति उसकी बात अनसुनी कर के पाप करता रहे। 
     रावण को मित्र के रूप में वही पसन्द कर सकते हैं जिनका चरित्र बाली के जैसा हो। जो अपने छोटे भाई की स्त्री को बलपूर्वक छीनने में लज्जा का अनुभव नहीं करता हो। जो तारा जैसी विदुषी पत्नी की भी कोई बात नहीं मानता हो। ऐसे लोग भी सम्मान के योग्य नहीं होते।
      रावण को अपना नायक वही मान सकते हैं जिन्हें न धर्म का ज्ञान है, न वेद का। रावण उन राक्षसों का नायक था जो ऋषियों के हवन कुंड में हड्डियां डालते थे, जो ऋषियों को मार कर खा जाते थे, जो मनुष्यों को जीने नहीं देते थे। रावण ऐसे ही अमानुषों का नायक हो सकता है।
       रावण को एक आदर्श पुत्र मानने वाले मूर्ख ही हैं, क्योंकि रावण के कुकर्मों के कारण स्वयं उसके पिता ने उसका त्याग कर दिया था। जिस व्यक्ति के कारण उसका लज्जित पिता नगर छोड़ दे, वह और कुछ भी हो आदर्श पुत्र नहीं हो सकता।
      रावण ब्राह्मणों का नायक न था, न है, न होगा... ब्राह्मणों के आदर्श हैं वे गुरु वशिष्ठ जिन्होंने राजकुमार राम को मर्यादा पुरुषोत्तम राम बनाया। ब्राह्मणों के नायक हैं वे दधीचि, जिन्होंने धर्म की रक्षा के लिए अपनी हड्डियां दान कर दी। आधुनिक काल मे भी ब्राह्मणों के नायक चाणक्य, वर्षकार, पतंजलि, शंकराचार्य, या करपात्री जी महाराज हैं, कोई रावण नहीं है। रावण उन ब्राह्मण वंशियो को ही प्रिय हो सकता है जिन्होंने धर्म का त्याग कर वामपंथ स्वीकार किया हो, वे इतने महत्वपूर्ण नहीं कि वे ब्राह्मणों को दिशा दें। मैं तो उन्हें ब्राह्मण ही नहीं मानता।
      भारतीय लोक रावण को हर विजया के दिन बुराई के प्रतीक के रूप में जलाता रहा है, और जलाता रहेगा। आज भी, और हजार वर्ष बाद भी... लोक किताबी विचारकों की बात नहीं सुनता, उसकी गोद में रोज हजारों चार्वाक, मार्क्स, कन्फ्यूशियस जन्म लेते हैं और मर जाते हैं। लोक अपने ही गति से मुस्कुराता हुआ चलता रहता है। यही भारत है...

सर्वेश तिवारी श्रीमुख
गोपालगंज, बिहार।

आखिर क्या है यह पूरा खालिस्तान मसला

आखिर क्या है यह पूरा खालिस्तान मसला

            खालिस्तान को समझने के लिए यह जानना जरूरी है: 15 अगस्त, 1947 को हमारा देश आजाद हुआ था और दो हिस्सों में बांटा गया था। इसी के साथ बंटा था पंजाब सूबा। जिसका बड़ा भाग पाकिस्तान के पास चला गया और कुछ हिस्सा हमारे पास बचा। बंटवारे के दौरान हिंदुओ और मुस्लिमों को जान-माल का बहुत नुकसान हुआ। लेकिन सबसे ज्यादाN नुकसान सिखों को हुआ। भारत के सिखों को और नए-नए बने पाकिस्तान के सिखों को। लाहौर, जो कभी सिख साम्राज्य की राजधानी था वो एक मुस्लिम राष्ट्र में चला गया। इससे आहत होकर फुसफुसाहट में ही सही सिखों की भी अलग राष्ट्र की मांग जोर पकड़ने लगी।
            पंजाबी भाषी लोगों के लिए एक अलग राज्य की मांग की शुरुआत पंजाबी सूबा आंदोलन से हुई थी। यह पहला मौका था जब पंजाब को भाषा के आधार पर अलग दिखाने की कोशिश हुई थी। अकाली दल का जन्म हुआ और कुछ ही वक्त में इस पार्टी ने बेशुमार लोकप्रियता हासिल कर ली। अलग पंजाब के लिए जबरदस्त प्रदर्शन शुरू हुए और अंत में 1966 में ये मांग मान ली गई। भाषा के आधार पर पंजाब, हरियाणा और केंद्र शाषित प्रदेश चंडीगढ़ की स्थापना हुई।
आनंदपुर साहिब रेसोल्यूशन के नाम पर उठाई गई मांगें
हरियाणा में पंजाबी भाषी या सिख बाहुल्य जिलों को पंजाब को देना
चंडीगढ़ पूरी तरह पंजाब को देना
पंजाब में भूमि सुधार और औद्योगिकरण
पूरे देश में गुरुद्वारा समिति का निर्माण
फौज में सिखों की भर्ती अधिक से अधिक हालांकि इस मांग को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि यह ‘देशद्रोही’ मांगें हैं। उन्होंने कहा था कि ये कोई ऑटोनोमी की मांग नहीं है, बल्कि उसकी आड़ में अलग देश की संरचना बनाने की योजना है।
'खालिस्तान' के तौर पर स्वायत्त राज्य की मांग ने 1980 के दशक में जोर पकड़ा। धीरे-धीरे ये मांग बढ़ने लगी और इसे खालिस्तान आंदोलन का नाम दिया गया। 
परंतु 'दमदमी टकसाल' के जरनैल सिंह भिंडरावाला की लोकप्रियता बढ़ने के साथ ही ये आंदोलन हिंसक होता चला गया।
जरनैल सिंह भिंडरावाला के बारे में कहा जाता है कि वो सिख धर्म में कट्टरता का समर्थक था। सिखों के शराब पीने, बाल कटाने जैसी चीजों के वो सख्त खिलाफ था।
डीआईजी हत्या से बिगड़ा मामला साल 1980-1984 के बीच पंजाब में आतंकी हिंसाओं ने जबरदस्त उछाल आया। 1983 में पंजाब के डीआईजी अटवाल की स्वर्ण मंदिर परिसर में ही हत्या कर दी गई। इसी साल से भिंडरावाला ने स्वर्ण मंदिर को अपना ठिकाना बना लिया था। सैकड़ों हथियारबंद सुरक्षाकर्मियों से वो हमेशा घिरा रहता था, साथ ही हथियारों का जखीरा भी वहां जुटाया जाने लगा था। कह सकते हैं कि मंदिर को किले में तब्दील करने की तैयारी शुरू हो गई थी।
*( मजे की बात ये की दशम गुरुओं के दैविक कर्मो के द्वारा सनातन की रक्षा के लिए तैयार हुए सिक्ख पंथ की बुनियादी बातों के विरुद्ध कार्य करने वाले और पवित्र स्वर्ण मंदिर की मर्यादा भंग करने वालों पर सिक्ख कुछ नहीं कहते। इसके उलट जिन इस्लामिक आततायियों के दुष्कृत्यों के विरुद्ध सनातन में से सिक्ख पंथ खड़ा हुआ था और जिन पाकिस्तानियों ने पंजाब का अधिकांश हिस्सा हड़पा जिसके विरुद्ध खालिस्तान के विचार का उदय हुआ, उन्हीं सनातन विरोधी इस्लामिक जिहादियों के साथ आज खालिस्तानी खड़े हैं  )*
            तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के लिए सिरदर्द बने इस मुद्दे के कई विकल्प शुरुआत में तलाशे गए। भिंडरवाला को स्वर्ण मंदिर से निकालने की तैयारी की जाने लगी। 'ऑपरेशन सनडाउन' बनाया गया, 200 कमांडोज को इसके लिए ट्रेनिंग दी गई। लेकिन बाद में आम नागरिकों को ज्यादा नुकसान की आशंका के चलते इस ऑपरेशन को नकार दिया गया।
सिख संत से खालसा आतंकी बनने की कहानी
रणप्रिय सिखों में सेना के प्रति झुकाव कई बार उनके नाम से पता चल जाता है। जैसे- जरनैल सिंह, करनैल सिंह और मेजर सिंह आदि। जरनैल शब्द की उत्पत्ति सेना के पद जनरल से हुई है, उसी तरह करनैल शब्द कर्नल से आया है।
एक समय पंजाब को ब्रितानी-भारतीय सेना में भर्ती के लिए सबसे उपजाऊ जमीन माना जाता था। ये एक अजीब इत्तेफाक है कि जिस व्यक्ति को 1980 के दशक में सिख चरमपंथ का जन्मदाता माना जाता है, उनके माता-पिता ने उनका नाम जरनैल सिंह रखा था।

जरनैल सिंह के नाम के साथ भिंडरांवाले तब जुड़ा जब वो अपेक्षाकृत कम उम्र में सिख धर्म और ग्रंथों के बारे में शिक्षा देने वाली संस्था-दमदमी टकसाल का अध्यक्ष चुना गया था। कहा जाता है कि अकाली दल की राजनीति को कमजोर करने के लिए इंदिरा गांधी ने खुद ही भिंडरावाला को आगे बढ़ाया ।
भगत सिंह और संत भिंडरांवाले भिंडरांवाले का रहस्यपूर्ण, लेकिन असाधारण तरीके से प्रमुखता में आना पंजाब में 'मुक्ति' की सबसे भीषण लड़ाई के बारे में काफी कुछ बताता है और इस लड़ाई को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सिख सुमदाय से जोड़कर भी देखा जाता है।
दमदमी टकसाल के अध्यक्ष का पद
उस समय कोई इस बात की कल्पना नहीं कर सकता था कि 30 वर्ष की आयु में जिस भिंडरांवाले ने दमदमी टकसाल के अध्यक्ष का पद ग्रहण किया था। अगले कुछ महीनों में ऐसी नई परिकल्पना को हवा देगा कि इस सीमांत प्रांत में अप्रत्याशित उथल-पुथल पैदा हो जाएगी। फिर ये उथल-पुथल एक दशक से अधिक तक चली और इस दौरान निर्दोष लोगों समेत हजारों की जान चली गई।
            वर्ष 1977 में उसे दमदमी टकसाल का प्रमुख नियुक्त किए जाने के साक्षी, उस समय के मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल और सिखों की सबसे बड़ी धार्मिक संस्था शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के अध्यक्ष गुरचरण सिंह तोहड़ा थे, जो अपनी शुभकामनाएं देने के लिए वहीं मौजूद थे।
क्या है दमदमी टकसाल
दमदमी टकसाल एक सिख शैक्षिकN संगठन है। जिसका मुख्यालय अमृतसर से 25 मील दूर चौक मेहता शहर में स्थित है।
भिंडरांवाले की नियुक्ति के तुरंत बाद उस इलाके में राजनीतिक विमर्श बदलने लगा। जिस समय भिंडरांवाले ने दमदमी टकसाल के अध्यक्ष का पद ग्रहण किया था, उस समय दमदमी टकसाल का सीधा टकराव निरंकारियों से हो चुका था।
प्रदर्शनकारी दमदमी टकसाल और अखंड कीर्तनी जत्थे से संबंधित थे। वर्ष 1978 की खूनी वैशाखी की घटना के बाद पंजाब जैसे हमेशा के लिए बदल गया, दोबारा पहले जैसा कभी नहीं हो पाया।
ऑपरेशन ब्लू स्टारआखिर में इंडियन आर्मी ने 'ऑपरेशन ब्लू स्टार' को अंजाम दिया गया। 1 से 3 जून 1984 के बीच पंजाब की रेल, रोड और एयर ट्रांसपोर्ट सर्विस को रोक दिया गया। स्वर्ण मंदिर में पानी और बिजली की सप्लाई काट दी गई। स्वर्ण मंदिर के अंदर 6 जून 1984 को व्यापक अभियान चलाया गया, भारी गोलीबारी के बाद जरनैल सिंह भिंडरवाला का शव बरामद कर लिया गया। 7 जून 1984 को स्वर्ण मंदिर पर भारतीय सेना का नियंत्रण हो गया।
           इस ऑपरेशन के बाद सिख समुदाय के लोग इंदिरा गांधी सरकार के खिलाफ जबरदस्त गुस्से में थे, कैप्टन अमरिंदर सिंह समेत कई सिख नेताओं ने कांग्रेस से इस्तीफा दे दिया था। खुशवंत सिंह समेत कई लेखकों ने अपने अवॉर्ड वापस कर दिए थे।
            महज 4 महीने बाद ही 31 अक्टूबर 1984 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या उनके ही 2 सिख सुरक्षाकर्मियों ने कर दी थी।
खालिस्तान आंदोलन यहीं खत्म नहीं हुआ, इसके बाद से कई छोटे-बड़े संगठन बने। 23 जून 1985 को एक सिख राष्ट्रवादी ने एयर इंडिया के कैनेडा फ्लाईट विमान में विस्फोट किया, 329 लोगों की मौत हुई थी। दोषी ने इसे भिंडरवाला की मौत का बदला बताया।

            10 अगस्त 1986 को पूर्व थलसेनाध्यक्ष जनरल एएस वैद्य की दो बाइक सवार बदमाशों ने हत्या कर दी थी। वैद्य ने ऑपरेशन ब्लूस्टार को लीड किया था। इस वारदात की जिम्मेदारी खालिस्तान कमांडो फोर्स नाम के एक संगठन ने ली थी। 31 अगस्त 1995 को पंजाब सिविल सचिवालय के पास हुए बम विस्फोट में पंजाब के तत्कालीन सीएम बेअंत सिंह की हत्या कर दी गई थी। ब्लास्ट में 15 से ज्यादा लोगों की मौत हुई थी।
 यद्यपि भारत मे ये आंदोलन मृतप्रायः है परंतु पाकिस्तान के द्वारा इसे खुला समर्थन दिया जाता है । कैनेडा जहां हिन्दूओं में से भी विशेषकर सिक्ख पंथी सम्पन्न और राजनीतिक रूप से बहुत सक्रिय हैं द्वारा इसे आर्थिक और राजनीतिक समर्थन दिया जाता है । साथ ही इसे भारत में देशविरोधी तत्वों द्वारा अंदरूनी सहायता दी जाती है ।
            आज जो किसान आंदोलन के नाम से देश विरोधी प्रपंच चलाया जा रहा है उसे अंदरखाने खालिस्तान आंदोलन से जुड़े संगठन ही *"ऑपरेट"* कर रहे हैं, उसी तरह जिस तरह *शाहीन बाग* प्रपंच को अंदरखाने *पी एफ आई* नामक राजनीतिक की आड़ में एक उग्र मुस्लिम जिहादी संगठन चला रहा था।मजे की बात ये है कि ये तथाकथित खालिस्तानी नेता उस आंदोलन को समर्थन दे रहे थे, अब *पी एफ आई*  इस तथाकथित किसान आंदोलन को समर्थन दे रहा है।
            देश के लिए चिन्ता की बात ये है कि देश की संप्रभुता,अखंडता और एकता के विरोधी तत्व यथा: कम्युनिस्ट, नक्सली और अर्बन नक्सली,चर्च की देश विरोधी-सनातन विरोधी शक्तियां,सनातन विरोधी इस्लामिक जिहादी शक्तियां और इनके समर्थक और वर्षों से इन्हें पालने वाले राजनीतिक दल अब एक साथ होकर राष्ट्र विरोधी कार्य ही नहीं कर रहे हर राष्ट्र विरोधी कार्यों का समर्थन और सहयोग कर रहे हैं। ये देश के लिए अत्यंत घातक है।