August 10, 2025
बोधकथा - अक्रोधी और सत्यवादी युधिष्ठर akrodhee aur satyavaadee yudhishthar
Educational Qualification: 1. High School Passed from M.P. Board Bhopal in 2007 with 86%. 2. Higher Secondary (Mathematics) Passed from M.P. Board Bhopal in 2009 with 81 %. (Math’s Mark 97%) 3. B.Sc. (Mathematics) Passed from M.P. Bhoj University Bhopal in 2015 with 63 %. 4. M.Sc. (Mathematics) Passed from M.P. Bhoj University Bhopal in 2017 with 61% 5. Master Of Social Work in Running from Mahatma Gandhi Chitrakoot Gramodaya Vishwavidyalaya, Satna MP Other Qualification: 1. Computer Course of Three Month (CCA) 2. BE (CS) third Sem MPCTM Collage. 3. BTC 20 Days Camp Surya Foundation from Delhi. 4. OTC in RSS second Year
April 04, 2021
हिंदू नववर्ष नवसंवत्सर 2078, 13 अप्रैल 2021 खास बातें।
हिंदू नववर्ष नवसंवत्सर 2078, 13 अप्रैल 2021
प्रत्येक वर्ष चैत्र शुक्ल प्रतिपदा के दिन से बसंत नवरात्रि आरंभ हो जाते हैं। चैत्र नवरात्रि से ही हिंदू नववर्ष की शुरूआत मानी जाती है। चैत्र माह हिंदू नववर्ष का पहला महीना माना जाता है। इस दिन से ही पूरे वर्ष भर के अनुष्ठानों, पर्वों आदि के शुभ मुहूर्त तय किए जाते हैं। इस बार हिंदू नववर्ष नवसंवत्सर 2078, 13 अप्रैल 2021 को आरंभ हो रहा है। इस बार 14 मार्च से खरमास आरंभ हुए थे, जो 14 अप्रैल के समाप्त हो रहा है। यही कारण है कि नववर्ष के साथ ही शुभ मांगलिक कार्य भी आरंभ हो जाएंगे। तो चलिए जानते हैं नवसंवत्सर 2078 की खास बातें।
विचित्र संयोग
हिंदू ग्रंथों में 60 संवत्सर का उल्लेख
किया गया है। जिसके हिसाब से क्रमानुसार हर नवसंवत्सर का नाम निर्धारित होता है।
इस तरह से नवसंवत्सर 2077 का नाम ''प्रमादी''
है, इसके अनुसार 2078
में इस नवसंवत्सर का नाम आनंद संवत्सर होना चाहिए लेकिन इस बार विचित्र संयोग बन
रहा है इस संवत्सर का नाम ''आनंद'' न
होकर ''राक्षस'' संवत्सर होगा।
गुड़ी पड़वा
गुड़ी पड़वा (मराठी-पाडवा) के दिन हिन्दू नव संवत्सरारम्भ माना जाता है चैत्र मास की शुक्ल प्रतिपदा को गुड़ी पड़वा या वर्ष प्रतिपदा या उगादि (युगादि) कहा जाता है। इस दिन हिन्दु नववर्ष का आरम्भ होता है। 'गुड़ी' का अर्थ 'विजय पताका' होता है। कहते हैं शालिवाहन ने मिट्टी के सैनिकों की सेना से प्रभावी शत्रुओं(शक)का पराभव किया। इस विजय के प्रतीक रूप में शालिवाहन शक का प्रारंभ इसी दिन से होता है। ‘युग‘ और ‘आदि‘ शब्दों की संधि से बना है ‘युगादि‘। आंध्र प्रदेश और कर्नाटक में ‘उगादि‘ और महाराष्ट्र में यह पर्व 'ग़ुड़ी पड़वा' के रूप में मनाया जाता है। इसी दिन चैत्र नवरात्रि का प्रारम्भ होता है।
परिचय
कहा जाता है कि इसी दिन ब्रह्माजी ने सृष्टि का निर्माण किया था। इसमें मुख्यतया ब्रह्माजी
और उनके द्वारा निर्मित सृष्टि के प्रमुख देवी-देवताओं, यक्ष-राक्षस,
गंधर्व, ऋषि-मुनियों, नदियों,
पर्वतों, पशु-पक्षियों और कीट-पतंगों का ही नहीं,
रोगों और उनके उपचारों तक का भी पूजन किया जाता है। इसी दिन से नया संवत्सर
शुरू होता है। अत इस तिथि को ‘नवसंवत्सर‘ भी कहते हैं। चैत्र ही एक ऐसा महीना है, जिसमें वृक्ष
तथा लताएं पल्लवित व पुष्पित होती हैं। शुक्ल प्रतिपदा का दिन चंद्रमा की कला का प्रथम
दिवस माना जाता है। जीवन का मुख्य आधार वनस्पतियों को सोमरस चंद्रमा ही प्रदान करता
है। इसे औषधियों और वनस्पतियों का राजा कहा गया है। इसीलिए इस दिन को वर्षारम्भ माना
जाता है।
आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और महाराष्ट्र में सारे घरों को आम के पेड़ की पत्तियों के बंदनवार से सजाया जाता है। सुखद जीवन की अभिलाषा के साथ-साथ यह बंदनवार समृद्धि, व अच्छी फसल के भी परिचायक हैं। ‘उगादि‘ के दिन ही पंचांग तैयार होता है।
पंचांग
महान गणितज्ञ भास्कराचार्य ने इसी दिन से सूर्योदय से सूर्यास्त तक दिन, महीना और वर्ष की गणना करते हुए ‘पंचांग ‘ की रचना की। चैत्र मास की शुक्ल प्रतिपदा को महाराष्ट्र में गुड़ीपड़वा कहा जाता है। वर्ष के साढ़े तीन मुहूतारें में गुड़ीपड़वा की गिनती होती है। शालिवाहन शक का प्रारंभ इसी दिन से होता है।
कहा जाता है कि शालिवाहन नामक एक कुम्हार
के लड़के ने मिट्टी के सैनिकों की सेना बनाई और उस पर पानी छिड़ककर उनमें प्राण फूँक
दिए और इस सेना की मदद से शिक्तशाली शत्रुओं को पराजित किया। इस विजय के प्रतीक के
रूप में शालिवाहन शक का प्रारंभ हुआ। कई लोगों की मान्यता है कि इसी दिन भगवान राम ने वानरराज बाली के अत्याचारी शासन से दक्षिण की प्रजा को मुक्ति
दिलाई। बाली के त्रास से मुक्त हुई प्रजा ने घर-घर में उत्सव मनाकर ध्वज (ग़ुड़ियां)
फहराए। आज भी घर के आंगन में ग़ुड़ी खड़ी करने की प्रथा महाराष्ट्र में प्रचलित है।
इसीलिए इस दिन को गुड़ीपडवा नाम दिया गया।
इस अवसर पर आंध्र प्रदेश में
घरों में ‘पच्चड़ी/प्रसादम‘ तीर्थ के रूप
में बांटा जाता है। कहा जाता है कि इसका निराहार सेवन करने से मानव निरोगी बना रहता
है। चर्म रोग भी दूर होता है। इस पेय में मिली वस्तुएं स्वादिष्ट होने के साथ-साथ आरोग्यप्रद
होती हैं। महाराष्ट्र में पूरन
पोली या मीठी रोटी बनाई जाती है। इसमें जो चीजें मिलाई जाती हैं वे हैं--गुड़, नमक, नीम के फूल, इमली और कच्चा आम। गुड़ मिठास के लिए, नीम के फूल कड़वाहट मिटाने के लिए और इमली व आम जीवन के खट्टे-मीठे स्वाद चखने
का प्रतीक होती हैं। यूँ तो आजकल आम बाजार में मौसम से पहले ही आ जाता है, किन्तु आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और महाराष्ट्र में इसी दिन से खाया जाता है। नौ दिन तक मनाया जाने वाला यह त्यौहार दुर्गापूजा के साथ-साथ, रामनवमी को राम और सीता के विवाह के
साथ सम्पन्न होता है।
इतिहास
में वर्ष प्रतिपदा
1.
ब्रह्म
पुराण के अनुसार ब्रह्मा द्वारा सृष्टि का सृजन
2.
मर्यादा
पुरूषोत्तम श्रीराम का राज्याभिषेक
3.
माँ
दुर्गा की उपासना की नवरात्र व्रत का प्रारम्भ
4.
युगाब्द
(युधिष्ठिर संवत्) का आरम्भ तथा उनका राज्याभिषेक
5.
उज्जयिनी सम्राट- विक्रमादित्य द्वारा विक्रमी संवत् प्रारम्भ
6.
शालिवाहन
शक संवत् (भारत सरकार
का राष्ट्रीय पंचांग) का प्रारम्भ
7.
महर्षि
दयानन्द द्वारा आर्य समाज की स्थापना का दिवस
8.
राष्ट्रीय
स्वयंसेवक संघ के संस्थापक केशव बलिराम हेडगेवार का जन्मदिवस
9.
सिख परंपरा के द्वितीय गुरु अंगद देव जी के जन्म दिवस
10.
सिंध प्रान्त के प्रसिद्ध समाज रक्षक वरूणावतार
संत झूलेलाल का प्रकट दिवस
भारतीय नववर्ष का प्राकृतिक महत्व :
1) वसंत ऋतु का आरंभ वर्ष प्रतिपदा से ही होता है
जो उल्लास, उमंग, खुशी तथा चारों तरफ
पुष्पों की सुगंधि से भरी होती है।
2) फसल पकने का प्रारंभ यानि किसान की मेहनत का
फल मिलने का भी यही समय होता है।
3) नक्षत्र शुभ स्थिति में होते हैं अर्थात् किसी भी कार्य को प्रारंभ करने के लिये यह शुभ मुहूर्त होता है।
भारतीय नववर्ष कैसे मनाएँ :
1) हम परस्पर एक दुसरे को नववर्ष की शुभकामनाएँ
दें। पत्रक बांटें , झंडे, बैनर....आदि
लगावे ।
2) आपने परिचित मित्रों, रिश्तेदारों
को नववर्ष के शुभ संदेश भेजें।
3) इस मांगलिक अवसर पर अपने-अपने घरों पर भगवा
पताका फेहराएँ।
4) आपने घरों के द्वार, आम
के पत्तों की वंदनवार से सजाएँ।
5) घरों एवं धार्मिक स्थलों की सफाई कर रंगोली
तथा फूलों से सजाएँ।
6) इस अवसर पर होने वाले धार्मिक एवं सांस्कृतिक
कार्यक्रमों में भाग लें अथवा कार्यक्रमों का आयोजन करें।
7) प्रतिष्ठानों की सज्जा एवं प्रतियोगिता करें।
झंडी और फरियों से सज्जा करें।
8) इस दिन के महत्वपूर्ण देवताओं, महापुरुषों से सम्बंधित प्रश्न मंच के आयोजन करें।
9) वाहन रैली, कलश यात्रा,
विशाल शोभा यात्राएं कवि सम्मेलन, भजन संध्या ,
महाआरती आदि का आयोजन करें।
10) चिकित्सालय, गौशाला में
सेवा, रक्तदान जैसे कार्यक्रम।
नव
वर्ष का प्रारम्भ प्रतिपदा से ही क्यों?
भारतीय नववर्ष का प्रारम्भ चैत्र शुक्ल
प्रतिपदा से ही माना जाता है और इसी दिन से ग्रहों,
वारों, मासों और संवत्सरों का प्रारंभ गणितीय और
खगोल शास्त्रीय संगणना के अनुसार माना जाता है। आज भी जनमानस से जुड़ी हुई यही शास्त्रसम्मत
कालगणना व्यावहारिकता की कसौटी पर खरी उतरी है। इसे राष्ट्रीय गौरवशाली परंपरा का प्रतीक
माना जाता है। विक्रमी संवत किसी संकुचित विचारधारा या पंथाश्रित नहीं है। हम इसको
पंथ निरपेक्ष रूप में देखते हैं। यह संवत्सर किसी देवी, देवता
या महान पुरुष के जन्म पर आधारित नहीं, ईस्वी या हिजरी सन की
तरह किसी जाति अथवा संप्रदाय विशेष का नहीं है। हमारी गौरवशाली परंपरा विशुद्ध अर्थो
में प्रकृति के खगोलशास्त्रीय सिद्धातों पर आधारित है और भारतीय कालगणना का आधार पूर्णतया
पंथ निरपेक्ष है। प्रतिपदा का यह शुभ दिन भारत राष्ट्र की गौरवशाली परंपरा का प्रतीक है। ब्रह्म
पुराण के अनुसार चैत्रमास के प्रथम दिन ही ब्रह्मा ने सृष्टि
संरचना प्रारंभ की। यह भारतीयों की मान्यता है, इसीलिए हम चैत्र
शुक्ल प्रतिपदा से नववर्षारंभ मानते हैं।
प्रकृति वसंतोत्सव
आज भी भारत में प्रकृति, शिक्षा तथा राजकीय कोष आदि के चालन-संचालन में
मार्च, अप्रैल के रूप में चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को ही देखते हैं।
यह समय दो ऋतुओं का संधिकाल है। इसमें रातें छोटी और दिन बड़े होने लगते हैं। प्रकृति
नया रूप धर लेती है। प्रतीत होता है कि प्रकृति नवपल्लव धारण कर नव संरचना के लिए ऊर्जस्वित
होती है। मानव, पशु-पक्षी, यहां तक कि जड़-चेतन
प्रकृति भी प्रमाद और आलस्य को त्याग सचेतन हो जाती है। वसंतोत्सव का भी यही आधार है।
इसी समय बर्फ पिघलने लगती है। आमों पर बौर आने लगता है। प्रकृति की हरीतिमा नवजीवन
का प्रतीक बनकर हमारे जीवन से जुड़ जाती है।
इसी प्रतिपदा के दिन आज से 2054 वर्ष पूर्व
उज्जयनी नरेश महाराज विक्रमादित्य ने विदेशी आक्रांत शकों से भारत-भू का रक्षण किया
और इसी दिन से काल गणना प्रारंभ की। उपकृत राष्ट्र ने भी उन्हीं महाराज के नाम से विक्रमी
संवत कह कर पुकारा। महाराज विक्रमादित्य ने आज से 2054 वर्ष पूर्व राष्ट्र को सुसंगठित
कर शकों की शक्ति का उन्मूलन कर देश से भगा दिया और उनके ही मूल स्थान अरब में विजयश्री
प्राप्त की। साथ ही यवन, हूण, तुषार, पारसिक तथा कंबोज देशों पर अपनी विजय ध्वजा फहराई।
उसी के स्मृति स्वरूप यह प्रतिपदा संवत्सर के रूप में मनाई जाती थी और यह क्रम पृथ्वीराज चौहान के समय तक चला। महाराजा विक्रमादित्य
ने भारत की ही नहीं, अपितु समस्त विश्व की सृष्टि की। सबसे प्राचीन
कालगणना के आधार पर ही प्रतिपदा के दिन को विक्रमी संवत के रूप में अभिषिक्त किया।
इसी दिन मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान रामचंद्र के राज्याभिषेक अथवा रोहण के रूप में मनाया
गया। यह दिन ही वास्तव में असत्य पर सत्य की विजय दिलाने वाला है। इसी दिन महाराज युधिष्टिर
का भी राज्याभिषेक हुआ और महाराजा विक्रमादित्य ने भी शकों पर विजय के उत्सव के रूप
में मनाया। आज भी यह दिन हमारे सामाजिक और धाíमक कार्यों के अनुष्ठान
की धुरी के रूप में तिथि बनाकर मान्यता प्राप्त कर चुका है। यह राष्ट्रीय स्वाभिमान
और सांस्कृतिक धरोहर को बचाने वाला पुण्य दिवस है। हम प्रतिपदा से प्रारंभ कर नौ दिन
में छह मास के लिए शक्ति संचय करते हैं, फिर अश्विन मास की नवरात्रि
में शेष छह मास के लिए शक्ति संचय करते हैं।
सन 78 में हूण वंश के सम्राट कनिष्क ने अपने राज्यारोहण के समय चैत्र शु. प्रतिपदा
के दिन शक संवत शुरू किया था ।
डिसक्लेमर
'इस लेख में निहित किसी भी जानकारी/सामग्री/गणना की सटीकता या विश्वसनीयता की गारंटी नहीं है। विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/मान्यताओं/धर्मग्रंथों से संग्रहित कर ये जानकारियां आप तक पहुंचाई गई हैं। हमारा उद्देश्य महज सूचना पहुंचाना है, इसके उपयोगकर्ता इसे महज सूचना समझकर ही लें। इसके अतिरिक्त, इसके किसी भी उपयोग की जिम्मेदारी स्वयं उपयोगकर्ता की ही रहेगी।'
Educational Qualification: 1. High School Passed from M.P. Board Bhopal in 2007 with 86%. 2. Higher Secondary (Mathematics) Passed from M.P. Board Bhopal in 2009 with 81 %. (Math’s Mark 97%) 3. B.Sc. (Mathematics) Passed from M.P. Bhoj University Bhopal in 2015 with 63 %. 4. M.Sc. (Mathematics) Passed from M.P. Bhoj University Bhopal in 2017 with 61% 5. Master Of Social Work in Running from Mahatma Gandhi Chitrakoot Gramodaya Vishwavidyalaya, Satna MP Other Qualification: 1. Computer Course of Three Month (CCA) 2. BE (CS) third Sem MPCTM Collage. 3. BTC 20 Days Camp Surya Foundation from Delhi. 4. OTC in RSS second Year
February 26, 2021
संत रविदास की जयंती 27 फरवरी 2021 Sant Ravi das ki jaynti 27 Feb 2021
माघ पूर्णिमा को संत रविदास की जयंती मनाई जाती है. इस साल 27 फरवरी 2021 को मनाई जाएगी. इस दिन गुरु रविदास के भक्त पवित्र नदी में स्नान आदि करते हैं और भजन-कीर्तन का आयोजन करते हैं साथ ही देश के कई हिस्सों में शोभा यात्राएं निकाली जाती हैं.
रविदास के जन्म की प्रामाणिक तिथि को लेकर मतभेद है. लेकिन ज्यादातर विद्वानों साल 1398 में माघ शुक्ल पूर्णिमा को उनकी जन्म तिथि मानते हैं. ऐसा कहा जाता है कि संत रविदास जी का जन्म रविवार के दिन हुआ था. जिसके चलते इनका नाम रविदास रखा गया
गुरु रविदास का जन्म उत्तर प्रदेश के वाराणसी शहर के गोबर्धनपुर गांव में हुआ था. उनके पिता संतोखदास भी जूते बनाने का काम करते थे. वहीं रैदास बचपन से साधु संतो के प्रभाव में रहने लगे थे. इसके चलते उनमें भक्ति की भावना बचपन से ही आ गई थी. इस दिन गुरु रविदास के दोहे भी पढ़े जाते हैं
एक पौराणिक कथा के अनुसार, रविदास जी अपने साथी के साथ खेल रहे थे. एक दिन खेलने के बाद दूसरे दिन उनका वह साथी नहीं आता है, तो रविदास जी उसे ढूंढ़ने चले जाते हैं. तभी उन्हें पता चलता है कि उसकी मृत्यु हो गई. यह जानकर रविदास जी बहुत दुखी होते हैं और अपने मित्र को बोलते हैं कि उठो ये समय सोने का नहीं है, मेरे साथ खेलो. उनकी बात सुनकर मृत मित्र खड़ा हो जाता है. यह चमत्कार इसलिए होता है क्योंकि रविदास जी को बचपन से ही आलौकिक शक्तियां प्राप्त थी. कुछ समय के बाद उन्होनें अपना पूरा ध्यान भगवान राम और कृष्ण की भक्ति में लगाया. इस तरह वह लोगों की भलाई करते हुए संत बन गए.
मन चंगा तो कठौती में गंगा
संत रविदास के दोहे अर्थ समेत – Ravidas ke Dohe with Meaning
संत रविदास का दोहा नंबर 1- Ravidas ke Dohe 1
महान संत रविदास जी ने इस दोहे में इन्सान के कर्मों के महत्व के बारे में व्याख्या की है। जो लोग सोचते हैं कि कोई इंसान जन्म लेने से ही बुरा और अच्छा बन जाता है, तो यह सोचना गलत है। क्योंकि सभी इंसान एक जैसे पैदा होते हैं लेकिन इंसान के कर्म ही उसे अच्छा या बुरा बनाती है।
दोहा:
रविदास’ जन्म के कारनै, होत न कोउ नीच,
नरकूँ नीच करि डारि है, ओछे करम की कीच
रविदास जी कहते है की सिर्फ जन्म लेने से कोई नीच नहीं बन जाता है लेकिन इन्सान के कर्म ही उसे नीच बनाते है।
महान संत रविदास जी के इस दोहे से हमें यह सीख मिलती है कि हमें हमेशा अच्छे कर्म करने चाहिए क्योंकि अच्छे कर्म ही इंसान को स्वर्ग का रास्ता दिखाते हैं।
संत रविदास का दोहा नंबर 2- Ravidas ke Dohe 2
इस दोहे में संत रविदास जी ने इंसान के पवित्र ह्रदय के बारे में व्याख्या की है कि जब इंसान पूरी तरह से अपनी जिंदगी में खुश रहता है तब उसे किसी भी तरह की चिंता नहीं सताती और वह इंसान थोड़े कम में भी गुजारा कर लेता है –
चंगा तो कठौती में गंगा
दोहे का हिन्दी में अर्थ:
महान संत रविदास जी कहते हैं कि अगर आपका मन और हृदय पवित्र है साक्षात् ईश्वर आपके हृदय में निवास करते है।
संत रविदास जी के इस दोहे से यह सीख मिलती है कि हमें अपने मन में किसी के प्रति ईर्ष्या का भाव नहीं रखना चाहिए क्योंकि साफ दिल वाले इंसान हमेशा खुश रहते हैं और अपनी जिंदगी में ऐसे काम करते हैं जो कि दूसरे को प्रेरणा दे सकें।
संत रविदास का दोहा नंबर 3- Ravidas ke Dohe 3
इस दोहे में संत रविदास जी ने यह व्याख्या की है कि जातिगत भेदभाव के अंतर से इंसान बंट चुके हैं जिन्हें तब तक एक नहीं किया जा सकता जब तक की जाति को जड़ से खत्म नहीं किया जाए, वहीं आज के समाज में कई लोग ऐसे हैं जो कि लोगों में जातिगत भेदभाव की भावना को बढ़ा रहे हैं, ऐसे लोगों के लिए संत रविदास जी का यह दोहा काफी ज्ञानवर्धक है –
जाति-जाति में जाति हैं, जो केतन के पात,
रविदास मनुष ना जुड़ सके जब तक जाति न जात
दोहा का हिन्दी में अर्थ:
महान संत रविदास जी कहते है की जिस तरह केले के पेड़ के तने को छीला जाए तो पत्ते के नीचे पत्ता फिर पत्ते के नीचे पत्ता और आखिरी में कुछ भी हासिल नहीं होता है लेकिन पूरा पेड़ नष्ट हो जाता है ठीक उसी तरह इंसानों को भी जातियों में बांट दिया गया है।
वहीं इन जातियों के बंटने से इन्सान तो अलग-अलग बंट जाता है और फिर वे भी केले के पत्तों की तरह आखिरी में खत्म हो जाते है लेकिन यह जाति खत्म नही होती है। इसलिए रविदास जी कहते है जब तक ये जाति खत्म नही होंगा तबतक इन्सान एक दूसरे से जुड़ नही सकता है या फिर एक नही हो सकता है।
संत रविदास जी के इस दोहे से हमें यह सीख मिलती है कि हमें जातिगत भेदभाव नहीं करना चाहिए और सभी को मिलजुल कर रहना चाहिए।
संत रविदास का दोहा नंबर 4- Ravidas ke Dohe 4
आज के समाज में कई लोग ऐसे भी हैं जो कि पूरी जिंदगी मोह-माया में पड़े रहते हैं और सिर्फ और सिर्फ पैसे कमाने के पीछे भागते रहते हैं न तो उन्हें रिश्तों का ध्यान होता है और न ही ऐसे लोग भगवान का ध्यान करते हैं। ऐसे ही लोगों के लिए संत रविदास जी ने अपने इस दोहे के माध्यम से बड़ी बात कही है जो कि इस प्रकार है –
हरि-सा हीरा छांड कै, करै आन की आस
ते नर जमपुर जाहिंगे, सत भाषै रविदास
दोहे का हिन्दी में अर्थ:
रविदास जी कहते हैं कि हीरे से बहुमूल्य हरी यानि ईश्वर को छोड़कर अन्य चीजों की आशा करते है उन्हें अवश्य ही नर्क जाना पड़ता है अर्थात प्रभु की भक्ति को छोड़कर इधर उधर भटकना व्यर्थ है।
हमें अपनी जिंदगी में ऐश और आराम के लिए पैसे कमाने के पीछे नहीं भागना चाहिए बल्कि ईश्वर की भक्ति में ध्यान लगाना चाहिए तभी हमें मोक्ष की प्राप्ति के लिए इधर-उधर नहीं भटकना पड़ेगा।
संत रविदास का दोहा नंबर 5- Ravidas ke Dohe 5
रविदास जी ने इस दोहे में उन लोगों के लिए सीख दी है जो लोग बिना कुछ कर्म किए ही फल की चिंता करने में लगे रहते हैं और अंत में कुछ नहीं हासिल होने पर भगवान को दोष देते हैं।
करम बंधन में बन्ध रहियो, फल की ना तज्जियो आस
कर्म मानुष का धर्म है, सत् भाखै रविदास
दोहे का हिन्दी में अर्थ:
रविदास जी कहते है की हमें हमेशा अपने कर्म में लगे रहना चाहिए और कभी भी कर्म के बदले मिलने वाले फल की आशा नही छोड़नी चाहिए क्योंकि कर्म करना हमारा धर्म है तो फल पाना भी हमारा सौभाग्य है।
संत रविदास जी के इस दोहे से हमें यह सीख मिलती है कि हमें हमेशा अच्छे कर्म करने चाहिए और कुछ हासिल करने के लिए प्रयत्न करते रहना चाहिए क्योंकि जो लोग कोशिश करते हैं उन्हें अपनी जिंदगी में तरक्की जरूर मिलती है।
संत रविदास का दोहा नंबर 6- Ravidas ke Dohe 6
इस दोहे में संत रविदास जी ने उन लोगों को सीख दी है जो लोग अपने विशालकाय शरीर या फिर ज्यादा पैसे होने पर घमंड करते हैं और अपने गुरूर में इतने डूबे रहते हैं और न ही किसी दूसरे की कदर करते हैं और ईश्वर की भक्ति की तरफ तो उनका बिल्कुल भी ध्यान नहीं होता हैं –
कह रविदास तेरी भगति दूरि है, भाग बड़े सो पावै।
तजि अभिमान मेटि आपा पर, पिपिलक हवै चुनि खावै।।
दोहे का हिन्दी में अर्थ:
रविदास जी के इस दोहे का आशय यही है कि ईश्वर की भक्ति बड़े भाग्य से प्राप्त होती है अगर आपमें थोड़ा सा भी घमंड नही है तो निश्चित ही आपका जीवन सफल रहता है ठीक वैसे ही, जैसे कि एक विशालकाय हाथी शक्कर के दानो को बिन नही सकता है लेकिन एक तुच्छ सी दिखने वाली चीटी भी शक्कर के इन दानो को आसानी से बिन लेती है इस प्रकार इंसानों को भी बडप्पन का भाव त्यागकर ईश्वर की भक्ति में अपना ध्यान लगाना चाहिए।
संत रविदास जी के इस दोहे से हमें यह सीख मिलती है कि हमें घमंड नहीं करना चाहिए क्योंकि घमंड इंसान को सफलता से असफलता की तरफ खींचता है और ईश्वर की भक्ति में अपना ध्यान लगाना चाहिए तभी हमें अपने जीवन के उद्देश्यों को हासिल करने में सफलता हासिल होगी।
रविदास का दोहा नंबर 7- Ravidas ke Dohe 7
संत रविदास जी ने अपने इस दोहे के माध्यम से यह बताने की कोशिश की है ईश्वर एक हैं, नाम अलग होने से ईश्वर की भक्ति का महत्व कम नहीं हो जाता है।
कृस्न, करीम, राम, हरि, राघव, जब लग एक न पेखा
वेद कतेब कुरान, पुरानन, सहज एक नहिं देखा
दोहे का हिन्दी में अर्थ:
रविदास जी कहते है की राम, कृष्ण, हरी, ईश्वर, करीम, राघव सब एक ही परमेश्वर के अलग अलग नाम है वेद, कुरान, पुराण आदि सभी ग्रंथो में एक ही ईश्वर का गुणगान किया गया है और सभी ईश्वर की भक्ति के लिए सदाचार का पाठ सिखाते है।
संत रविदास जी के इस दोहे से हमें यह सीख मिलती है कि हमें भगवान के अलग-अलग नामों पर नहीं पड़ना चाहिए बल्कि सच्चे मन से प्रभु की प्रार्थना करनी चाहिए क्योंकि ईश्वर एक ही है वहीं सभी ग्रंथों, कुरान, वेद और पुराणों में भी ईश्वर की भक्ति के लिए एक ही सदाचार का पाठ पढ़ाया गया है।
संत रविदास का दोहा नंबर 8- Ravidas ke Dohe 8
इस दोहे के माध्यम से महान संत रविदास जी ने खुद के बारे में यह बताने की कोशिश की है कि ईश्वर की सच्चे मन से प्रार्थना करने से उनके जीवन में काफी बदलाव आया और उनकी दोबारा उत्पत्ति मनुष्य के रूप में हुई है।
जा देखे घिन उपजै, नरक कुंड मेँ बास
प्रेम भगति सों ऊधरे, प्रगटत जन रविदास
दोहे का हिन्दी में अर्थ:
रविदास जी कहते है की जिस रविदास को देखने से लोगो को घृणा आती थी जिनका निवास नर्क कुंद के समान था ऐसे रविदास का ईश्वर की भक्ति में लीन हो जाना सच में फिर से उनकी मनुष्य के रूप में उत्पत्ति हो गयी है।
संत रविदास के इस दोहे से हमें यह सीख मिलती है कि ईश्वर की भक्ति से मनुष्य अज्ञानता से ज्ञान की तरफ अग्रसर होता है और अपने जीवन में तरक्की हासिल करता है।
संत रविदास का दोहा नंबर 9- Ravidas ke Dohe 9
इस दोहे के माध्यम से संत रविदास ने कहा है कि जो सच्चे मन से ईश्वर की भक्ति करता है उसका उद्धार होना स्वभाविक है –
रविदास कहै जाकै हदै, रहे रैन दिन राम
सो भगता भगवंत सम, क्रोध न व्यापै काम
दोहे का हिन्दी में अर्थ:
रविदास जी कहते हैं कि जिसके हृदय में रात-दिन राम समाए रहते हैं ऐसा भक्त होना राम के समान है क्योंकि फिर उसके ऊपर न तो क्रोध का असर होता है और न ही काम की भावना उस पर हावी होती है।
संत रविदास जी के इस दोहे से हमें यह सीख मिलती है कि हमें अपना ध्यान भगवान की भक्ति में लगाना चाहिए। ऐसा करने से मन शांत रहता है और इंसान हर फैसले बड़ी समझदारी से लेता है।
रविदास के पद अर्थ समेत – Ravidas ke Pad with Meaning
संत रविदास जी ने सिर्फ अपने दोहे के माध्यम से लोगों को सच्चाई के मार्ग पर चलने की ही सीख दी है बल्कि उन्होंने अपने पदों के माध्यम से लोगों में ईश्वर की भक्ति का महत्व भी समझाया और यह सीख दी कि ईश्वर की भक्ति से इंसान अपनी जिंदगी संवार सकता है और कुछ सकारात्मक तरीके से बदलाव कर सकता है –
आइए अब हम आपको संत रविदास जी के पदों के बारे में बताएंगे जो कि इस तरह हैं –
रविदास का पद नंबर 10 – Ravidas ke Pad 10
निम्नलिखित दोहे में संत रविदास जी ने भक्ति का वर्णन किया है और यह बताने की कोशिश की है कि अगर कोई भक्त सच्चे मन से ईश्वर की प्रार्थना करे तो इंसान का पूरा जीवन बदल सकता है। इस दोहे में उन्होंने खुद को भी प्रभु का दास बताया है –
पद:
अब कैसे छूटै राम नाम रट लागी।
प्रभु जी, तुम चंदन हम पानी, जाकी अँग-अँग बास समानी ।
प्रभु जी, तुम घन बन हम मोरा, जैसे चितवत चंद चकोरा ।
प्रभु जी, तुम दीपक हम बाती, जाकी जोति बरै दिन राती ।
प्रभु जी, तुम मोती हम धागा, जैसे सोनहिं मिलत सुहागा ।
प्रभु जी, तुम स्वामी हम दासा, ऐसी भक्ति करै रैदासा ॥
पद का हिन्दी में अर्थ:
प्रस्तुत पंक्तियों में कवि रविदास जी ने अपने भक्ति के भाव का वर्णन किया है। उनके मुताबिक जिस तरह प्रकृति में बहुत सारी चीजें एक दूसरे से जुड़ी रहती हैं। ठीक उसी तरह एक भक्त और भगवान् भी एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं।
आपको बता दें कि संत रविदास जी ने इस पद की पहली पंक्ति में प्रभु राम के नाम का गुण गान किया है। वे बोल रहे हैं कि अगर एक बार राम नाम रटने की लत लग जाए तो फिर वो कभी छूट नहीं सकती है।
इस पद में संत रविदास जी एक सच्चे भक्त की तुलना चंदन की लकड़ी से करते हुए कहा है कि एक सच्चा भक्त चन्दन की लकड़ी और पानी की तरह होते हैं और जब चन्दन की लकड़ी को पानी में डालकर छोड़ दिया जाता है तो उसकी सुगंध पूरे पानी में फ़ैल जाती है और पूरा पानी सुगंधित हो जाता है। ठीक उसी तरह भगवान भी अपनी सुगंध अपने भक्त के मन में छोड़ जाते हैं। जिसे सूंघकर एक भक्त सदा अपने प्रभु की भक्ति में लीन रहता है।
इस पद में आगे रविदास जी कहते हैं कि जब बारिश होने वाली होती है तो पूरे आसमान में चारों तरफ बादल घिर जाते हैं, ऐसे सुहाने मौसम में जंगल में मोर भी अपने पंख फैलाकर नाचे बिना नहीं रह सकता है, ठीक उसी तरह एक सच्चा भक्त भगवान का नाम लिए बिना नहीं रह सकता।
इस पद की तीसरी पंक्ति में संत रविदास जी कहते हैं कि जैसे एक दिए में बाती जलती रहती है, ठीक उसी तरह एक भक्त भी प्रभु की भक्ति में जलकर हमेशा प्रज्वलित होता रहता है। वहीं आगे इस पद की चौथी पंक्ति में कवि ने ईश्वर को मोती की तरह और भक्त को एक धागे की तरह बताया है, एक धागा जिसमें मोतियों को पिरोया जाता है।
इस तरह भक्त और भगवान दोनों ही एक-दूसरे के बिना अधूरे हैं और इसलिए कवि ने एक भक्त से भगवान के मिलन को सोने पर सुहागा बताया है। वहीं इस पद की आखिरी पंक्ति में संत रविदास जी ने अपनी भक्ति की व्याख्या करते हुए खुद को एक दास और प्रभु का स्वामी बताया है।
रविदास का पद नंबर 11 – Ravidas ke Pad 11
महान संत रविदास जी ने अपने इस पद में भगवान की महिमा का वर्णन किया है, उन्होंने कहा कि जो भी भक्त सच्चे मन से प्रभु की आराधना करता है, उसे तरक्की जरूर हासिल होती है क्योंकि भगवान अपने हर भक्त पर सामान भाव से कृपा करते हैं, बिना किसी भेदभाव के प्रभु कृपा करते हैं और अपने भक्तों का ख्याल रखते हैं।
कवि ने इस पद में खुद को इस पद में नीच और अभागा बताया है। इसके साथ ही उन्होंने यह भी बताया कि भगवान ने उन जैसे अभागे पर भी अपनी कृपा बरसाई है जिससे वह खुशी से फूले नहीं समां रहे हैं –
पद:
ऐसी लाल तुझ बिनु कउनु करै।
गरीब निवाजु गुसईआ मेरा माथै छत्रु धरै।।
जाकी छोति जगत कउ लागै ता पर तुहीं ढरै।
नीचहु ऊच करै मेरा गोबिंदु काहू ते न डरै॥
नामदेव कबीरु तिलोचनु सधना सैनु तरै।
कहि रविदासु सुनहु रे संतहु हरिजीउ ते सभै सरै॥
पद का हिन्दी में अर्थ:
संत रविदास जी ने इस पद में प्रभु की कृपा एवं महिमा का वर्णन करते हुए कहा है कि इस पूरी दुनिया में प्रभु से बड़ा दयालु और कृपालु कोई और नहीं है और वह गरीबों पर अपनी कृपा बरसाने वाले और दिन – दुखियों की सामान भाव से मद्द करने वाले हैं।
इसके अलावा संत रविदास जी ने इस पद में यह भी कहा है कि भगवान सभी को एक सामान भाव से देखते हैं और छूत-अछूत में कोई भेदभाव नहीं रखते हैं और इसी वजह से कवि रविदास जी इस पद में यह कह रह हैं कि उनके अछूत होने के बाद भी उन पर प्रभु ने असीम कृपा बरसाई है। वहीं प्रभु के इस कृपा की वजह से कवि को अपने माथे पर राजाओं जैसा छत्र महसूस हो रहा है।
इस पद में कवि ने खुद को नीच एवं अभागा बताते हुए कहा है कि उनके नीच होने के बाबजूद भी प्रभु ने उन पर सामान भाव से कृपा बरसाई है जिससे कवि बेहद प्रसन्न हैं। संत रविदास अपने प्रभु की महिमा का वर्णन करते हुए कह रहे हैं कि संत अपने भक्तों में भेद भाव नहीं करते हैं।
वे हमेशा अपने भक्तों को एक सामान दृष्टि से देखते हैं और सभी पर बिना किसी डर के और भेदभाव के एक समान कृपा बरसाते हैं। इसके साथ ही रविदास जी कहते हैं कि प्रभु के इसी गुण के वजह से नामदेव, कबीर जैसे जुलाहे साधना जैसे कसाई, सैन जैसे नाइ एवं त्रिलोचन जैसे सामान्य व्यक्तियों को भी इतनी ख्याति प्राप्त हुई है।
और प्रभु की कृपा से उन्होंने इस संसार रूपी सागर को पार कर लिया है। इसके साथ ही इस पद की आखिरी पंक्ति में कवि ने संतों से कहा कि है प्रभु की महिमा अपरम्पार है, वह कुछ भी कर सकते हैं।
निष्कर्ष:
संत रविदास ने अपने दोहे के माध्यम से लोगों में एक सकारात्मक ऊर्जा का विस्तार किया और समाज से फैली बुराइयों को दूर करने का प्रयत्न किया है। इसके साथ ही लोगों को सत्य के मार्ग पर चलने की सीख दी है जो कि वाकई सराहनीय है। वहीं महान संत रविदास जी के दोहों के अनुसरण से लोगों के जीवन में काफी हद तक बदलाव आ सकता है और इससे ईश्वर की भक्ति के महत्व का पता चलता है।
संत रविदास के दोहे अर्थ समेत – Ravidas ke Dohe with Meaning
संत रविदास का दोहा नंबर 1- Ravidas ke Dohe 1
महान संत रविदास जी ने इस दोहे में इन्सान के कर्मों के महत्व के बारे में व्याख्या की है। जो लोग सोचते हैं कि कोई इंसान जन्म लेने से ही बुरा और अच्छा बन जाता है, तो यह सोचना गलत है। क्योंकि सभी इंसान एक जैसे पैदा होते हैं लेकिन इंसान के कर्म ही उसे अच्छा या बुरा बनाती है।
दोहा:
रविदास’ जन्म के कारनै, होत न कोउ नीच,
नरकूँ नीच करि डारि है, ओछे करम की कीच
दोहे का हिन्दी में अर्थ:
रविदास जी कहते है की सिर्फ जन्म लेने से कोई नीच नहीं बन जाता है लेकिन इन्सान के कर्म ही उसे नीच बनाते है।
महान संत रविदास जी के इस दोहे से हमें यह सीख मिलती है कि हमें हमेशा अच्छे कर्म करने चाहिए क्योंकि अच्छे कर्म ही इंसान को स्वर्ग का रास्ता दिखाते हैं।
संत रविदास का दोहा नंबर 2- Ravidas ke Dohe 2
इस दोहे में संत रविदास जी ने इंसान के पवित्र ह्रदय के बारे में व्याख्या की है कि जब इंसान पूरी तरह से अपनी जिंदगी में खुश रहता है तब उसे किसी भी तरह की चिंता नहीं सताती और वह इंसान थोड़े कम में भी गुजारा कर लेता है –
दोहा:
मन चंगा तो कठौती में गंगा
दोहे का हिन्दी में अर्थ:
महान संत रविदास जी कहते हैं कि अगर आपका मन और हृदय पवित्र है साक्षात् ईश्वर आपके हृदय में निवास करते है।
संत रविदास जी के इस दोहे से यह सीख मिलती है कि हमें अपने मन में किसी के प्रति ईर्ष्या का भाव नहीं रखना चाहिए क्योंकि साफ दिल वाले इंसान हमेशा खुश रहते हैं और अपनी जिंदगी में ऐसे काम करते हैं जो कि दूसरे को प्रेरणा दे सकें।
संत रविदास का दोहा नंबर 3- Ravidas ke Dohe 3
इस दोहे में संत रविदास जी ने यह व्याख्या की है कि जातिगत भेदभाव के अंतर से इंसान बंट चुके हैं जिन्हें तब तक एक नहीं किया जा सकता जब तक की जाति को जड़ से खत्म नहीं किया जाए, वहीं आज के समाज में कई लोग ऐसे हैं जो कि लोगों में जातिगत भेदभाव की भावना को बढ़ा रहे हैं, ऐसे लोगों के लिए संत रविदास जी का यह दोहा काफी ज्ञानवर्धक है –
दोहा:
जाति-जाति में जाति हैं, जो केतन के पात,
रविदास मनुष ना जुड़ सके जब तक जाति न जात
दोहा का हिन्दी में अर्थ:1
महान संत रविदास जी कहते है की जिस तरह केले के पेड़ के तने को छीला जाए तो पत्ते के नीचे पत्ता फिर पत्ते के नीचे पत्ता और आखिरी में कुछ भी हासिल नहीं होता है लेकिन पूरा पेड़ नष्ट हो जाता है ठीक उसी तरह इंसानों को भी जातियों में बांट दिया गया है।
वहीं इन जातियों के बंटने से इन्सान तो अलग-अलग बंट जाता है और फिर वे भी केले के पत्तों की तरह आखिरी में खत्म हो जाते है लेकिन यह जाति खत्म नही होती है। इसलिए रविदास जी कहते है जब तक ये जाति खत्म नही होंगा तबतक इन्सान एक दूसरे से जुड़ नही सकता है या फिर एक नही हो सकता है।
संत रविदास जी के इस दोहे से हमें यह सीख मिलती है कि हमें जातिगत भेदभाव नहीं करना चाहिए और सभी को मिलजुल कर रहना चाहिए।
संत रविदास का दोहा नंबर 4- Ravidas ke Dohe 4
आज के समाज में कई लोग ऐसे भी हैं जो कि पूरी जिंदगी मोह-माया में पड़े रहते हैं और सिर्फ और सिर्फ पैसे कमाने के पीछे भागते रहते हैं न तो उन्हें रिश्तों का ध्यान होता है और न ही ऐसे लोग भगवान का ध्यान करते हैं। ऐसे ही लोगों के लिए संत रविदास जी ने अपने इस दोहे के माध्यम से बड़ी बात कही है जो कि इस प्रकार है –
दोहा:
हरि-सा हीरा छांड कै, करै आन की आस
ते नर जमपुर जाहिंगे, सत भाषै रविदास
दोहे का हिन्दी में अर्थ:
रविदास जी कहते हैं कि हीरे से बहुमूल्य हरी यानि ईश्वर को छोड़कर अन्य चीजों की आशा करते है उन्हें अवश्य ही नर्क जाना पड़ता है अर्थात प्रभु की भक्ति को छोड़कर इधर उधर भटकना व्यर्थ है।
हमें अपनी जिंदगी में ऐश और आराम के लिए पैसे कमाने के पीछे नहीं भागना चाहिए बल्कि ईश्वर की भक्ति में ध्यान लगाना चाहिए तभी हमें मोक्ष की प्राप्ति के लिए इधर-उधर नहीं भटकना पड़ेगा।
संत रविदास का दोहा नंबर 5- Ravidas ke Dohe 5
रविदास जी ने इस दोहे में उन लोगों के लिए सीख दी है जो लोग बिना कुछ कर्म किए ही फल की चिंता करने में लगे रहते हैं और अंत में कुछ नहीं हासिल होने पर भगवान को दोष देते हैं।
दोहा:
करम बंधन में बन्ध रहियो, फल की ना तज्जियो आस
कर्म मानुष का धर्म है, सत् भाखै रविदास
दोहे का हिन्दी में अर्थ:
रविदास जी कहते है की हमें हमेशा अपने कर्म में लगे रहना चाहिए और कभी भी कर्म के बदले मिलने वाले फल की आशा नही छोड़नी चाहिए क्योंकि कर्म करना हमारा धर्म है तो फल पाना भी हमारा सौभाग्य है।
संत रविदास जी के इस दोहे से हमें यह सीख मिलती है कि हमें हमेशा अच्छे कर्म करने चाहिए और कुछ हासिल करने के लिए प्रयत्न करते रहना चाहिए क्योंकि जो लोग कोशिश करते हैं उन्हें अपनी जिंदगी में तरक्की जरूर मिलती है।
संत रविदास का दोहा नंबर 6- Ravidas ke Dohe 6
इस दोहे में संत रविदास जी ने उन लोगों को सीख दी है जो लोग अपने विशालकाय शरीर या फिर ज्यादा पैसे होने पर घमंड करते हैं और अपने गुरूर में इतने डूबे रहते हैं और न ही किसी दूसरे की कदर करते हैं और ईश्वर की भक्ति की तरफ तो उनका बिल्कुल भी ध्यान नहीं होता हैं –
दोहा:
कह रविदास तेरी भगति दूरि है, भाग बड़े सो पावै।
तजि अभिमान मेटि आपा पर, पिपिलक हवै चुनि खावै।।
दोहे का हिन्दी में अर्थ:
रविदास जी के इस दोहे का आशय यही है कि ईश्वर की भक्ति बड़े भाग्य से प्राप्त होती है अगर आपमें थोड़ा सा भी घमंड नही है तो निश्चित ही आपका जीवन सफल रहता है ठीक वैसे ही, जैसे कि एक विशालकाय हाथी शक्कर के दानो को बिन नही सकता है लेकिन एक तुच्छ सी दिखने वाली चीटी भी शक्कर के इन दानो को आसानी से बिन लेती है इस प्रकार इंसानों को भी बडप्पन का भाव त्यागकर ईश्वर की भक्ति में अपना ध्यान लगाना चाहिए।
संत रविदास जी के इस दोहे से हमें यह सीख मिलती है कि हमें घमंड नहीं करना चाहिए क्योंकि घमंड इंसान को सफलता से असफलता की तरफ खींचता है और ईश्वर की भक्ति में अपना ध्यान लगाना चाहिए तभी हमें अपने जीवन के उद्देश्यों को हासिल करने में सफलता हासिल होगी।
रविदास का दोहा नंबर 7- Ravidas ke Dohe 7
संत रविदास जी ने अपने इस दोहे के माध्यम से यह बताने की कोशिश की है ईश्वर एक हैं, नाम अलग होने से ईश्वर की भक्ति का महत्व कम नहीं हो जाता है।
दोहा:
कृस्न, करीम, राम, हरि, राघव, जब लग एक न पेखा
वेद कतेब कुरान, पुरानन, सहज एक नहिं देखा
दोहे का हिन्दी में अर्थ:
रविदास जी कहते है की राम, कृष्ण, हरी, ईश्वर, करीम, राघव सब एक ही परमेश्वर के अलग अलग नाम है वेद, कुरान, पुराण आदि सभी ग्रंथो में एक ही ईश्वर का गुणगान किया गया है और सभी ईश्वर की भक्ति के लिए सदाचार का पाठ सिखाते है।
संत रविदास जी के इस दोहे से हमें यह सीख मिलती है कि हमें भगवान के अलग-अलग नामों पर नहीं पड़ना चाहिए बल्कि सच्चे मन से प्रभु की प्रार्थना करनी चाहिए क्योंकि ईश्वर एक ही है वहीं सभी ग्रंथों, कुरान, वेद और पुराणों में भी ईश्वर की भक्ति के लिए एक ही सदाचार का पाठ पढ़ाया गया है।
संत रविदास का दोहा नंबर 8- Ravidas ke Dohe 8
इस दोहे के माध्यम से महान संत रविदास जी ने खुद के बारे में यह बताने की कोशिश की है कि ईश्वर की सच्चे मन से प्रार्थना करने से उनके जीवन में काफी बदलाव आया और उनकी दोबारा उत्पत्ति मनुष्य के रूप में हुई है।
दोहा:
जा देखे घिन उपजै, नरक कुंड मेँ बास
प्रेम भगति सों ऊधरे, प्रगटत जन रविदास
दोहे का हिन्दी में अर्थ:
रविदास जी कहते है की जिस रविदास को देखने से लोगो को घृणा आती थी जिनका निवास नर्क कुंद के समान था ऐसे रविदास का ईश्वर की भक्ति में लीन हो जाना सच में फिर से उनकी मनुष्य के रूप में उत्पत्ति हो गयी है।
संत रविदास के इस दोहे से हमें यह सीख मिलती है कि ईश्वर की भक्ति से मनुष्य अज्ञानता से ज्ञान की तरफ अग्रसर होता है और अपने जीवन में तरक्की हासिल करता है।
संत रविदास का दोहा नंबर 9- Ravidas ke Dohe 9
इस दोहे के माध्यम से संत रविदास ने कहा है कि जो सच्चे मन से ईश्वर की भक्ति करता है उसका उद्धार होना स्वभाविक है –
दोहा:
रविदास कहै जाकै हदै, रहे रैन दिन राम
सो भगता भगवंत सम, क्रोध न व्यापै काम
दोहे का हिन्दी में अर्थ:
रविदास जी कहते हैं कि जिसके हृदय में रात-दिन राम समाए रहते हैं ऐसा भक्त होना राम के समान है क्योंकि फिर उसके ऊपर न तो क्रोध का असर होता है और न ही काम की भावना उस पर हावी होती है।
संत रविदास जी के इस दोहे से हमें यह सीख मिलती है कि हमें अपना ध्यान भगवान की भक्ति में लगाना चाहिए। ऐसा करने से मन शांत रहता है और इंसान हर फैसले बड़ी समझदारी से लेता है।
रविदास के पद अर्थ समेत – Ravidas ke Pad with Meaning
संत रविदास जी ने सिर्फ अपने दोहे के माध्यम से लोगों को सच्चाई के मार्ग पर चलने की ही सीख दी है बल्कि उन्होंने अपने पदों के माध्यम से लोगों में ईश्वर की भक्ति का महत्व भी समझाया और यह सीख दी कि ईश्वर की भक्ति से इंसान अपनी जिंदगी संवार सकता है और कुछ सकारात्मक तरीके से बदलाव कर सकता है –
आइए अब हम आपको संत रविदास जी के पदों के बारे में बताएंगे जो कि इस तरह हैं –
रविदास का पद नंबर 10 – Ravidas ke Pad 10
निम्नलिखित दोहे में संत रविदास जी ने भक्ति का वर्णन किया है और यह बताने की कोशिश की है कि अगर कोई भक्त सच्चे मन से ईश्वर की प्रार्थना करे तो इंसान का पूरा जीवन बदल सकता है। इस दोहे में उन्होंने खुद को भी प्रभु का दास बताया है –
पद:
अब कैसे छूटै राम नाम रट लागी।
प्रभु जी, तुम चंदन हम पानी, जाकी अँग-अँग बास समानी ।
प्रभु जी, तुम घन बन हम मोरा, जैसे चितवत चंद चकोरा ।
प्रभु जी, तुम दीपक हम बाती, जाकी जोति बरै दिन राती ।
प्रभु जी, तुम मोती हम धागा, जैसे सोनहिं मिलत सुहागा ।
प्रभु जी, तुम स्वामी हम दासा, ऐसी भक्ति करै रैदासा ॥
पद का हिन्दी में अर्थ:
प्रस्तुत पंक्तियों में कवि रविदास जी ने अपने भक्ति के भाव का वर्णन किया है। उनके मुताबिक जिस तरह प्रकृति में बहुत सारी चीजें एक दूसरे से जुड़ी रहती हैं। ठीक उसी तरह एक भक्त और भगवान् भी एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं।
आपको बता दें कि संत रविदास जी ने इस पद की पहली पंक्ति में प्रभु राम के नाम का गुण गान किया है। वे बोल रहे हैं कि अगर एक बार राम नाम रटने की लत लग जाए तो फिर वो कभी छूट नहीं सकती है।
इस पद में संत रविदास जी एक सच्चे भक्त की तुलना चंदन की लकड़ी से करते हुए कहा है कि एक सच्चा भक्त चन्दन की लकड़ी और पानी की तरह होते हैं और जब चन्दन की लकड़ी को पानी में डालकर छोड़ दिया जाता है तो उसकी सुगंध पूरे पानी में फ़ैल जाती है और पूरा पानी सुगंधित हो जाता है। ठीक उसी तरह भगवान भी अपनी सुगंध अपने भक्त के मन में छोड़ जाते हैं। जिसे सूंघकर एक भक्त सदा अपने प्रभु की भक्ति में लीन रहता है।
इस पद में आगे रविदास जी कहते हैं कि जब बारिश होने वाली होती है तो पूरे आसमान में चारों तरफ बादल घिर जाते हैं, ऐसे सुहाने मौसम में जंगल में मोर भी अपने पंख फैलाकर नाचे बिना नहीं रह सकता है, ठीक उसी तरह एक सच्चा भक्त भगवान का नाम लिए बिना नहीं रह सकता।
इस पद की तीसरी पंक्ति में संत रविदास जी कहते हैं कि जैसे एक दिए में बाती जलती रहती है, ठीक उसी तरह एक भक्त भी प्रभु की भक्ति में जलकर हमेशा प्रज्वलित होता रहता है। वहीं आगे इस पद की चौथी पंक्ति में कवि ने ईश्वर को मोती की तरह और भक्त को एक धागे की तरह बताया है, एक धागा जिसमें मोतियों को पिरोया जाता है।
इस तरह भक्त और भगवान दोनों ही एक-दूसरे के बिना अधूरे हैं और इसलिए कवि ने एक भक्त से भगवान के मिलन को सोने पर सुहागा बताया है। वहीं इस पद की आखिरी पंक्ति में संत रविदास जी ने अपनी भक्ति की व्याख्या करते हुए खुद को एक दास और प्रभु का स्वामी बताया है।
रविदास का पद नंबर 11 – Ravidas ke Pad 11
महान संत रविदास जी ने अपने इस पद में भगवान की महिमा का वर्णन किया है, उन्होंने कहा कि जो भी भक्त सच्चे मन से प्रभु की आराधना करता है, उसे तरक्की जरूर हासिल होती है क्योंकि भगवान अपने हर भक्त पर सामान भाव से कृपा करते हैं, बिना किसी भेदभाव के प्रभु कृपा करते हैं और अपने भक्तों का ख्याल रखते हैं।
कवि ने इस पद में खुद को इस पद में नीच और अभागा बताया है। इसके साथ ही उन्होंने यह भी बताया कि भगवान ने उन जैसे अभागे पर भी अपनी कृपा बरसाई है जिससे वह खुशी से फूले नहीं समां रहे हैं –
पद:
ऐसी लाल तुझ बिनु कउनु करै।गरीब निवाजु गुसईआ मेरा माथै छत्रु धरै।।जाकी छोति जगत कउ लागै ता पर तुहीं ढरै।नीचहु ऊच करै मेरा गोबिंदु काहू ते न डरै॥नामदेव कबीरु तिलोचनु सधना सैनु तरै।कहि रविदासु सुनहु रे संतहु हरिजीउ ते सभै सरै॥
पद का हिन्दी में अर्थ:
संत रविदास जी ने इस पद में प्रभु की कृपा एवं महिमा का वर्णन करते हुए कहा है कि इस पूरी दुनिया में प्रभु से बड़ा दयालु और कृपालु कोई और नहीं है और वह गरीबों पर अपनी कृपा बरसाने वाले और दिन – दुखियों की सामान भाव से मद्द करने वाले हैं।
इसके अलावा संत रविदास जी ने इस पद में यह भी कहा है कि भगवान सभी को एक सामान भाव से देखते हैं और छूत-अछूत में कोई भेदभाव नहीं रखते हैं और इसी वजह से कवि रविदास जी इस पद में यह कह रह हैं कि उनके अछूत होने के बाद भी उन पर प्रभु ने असीम कृपा बरसाई है। वहीं प्रभु के इस कृपा की वजह से कवि को अपने माथे पर राजाओं जैसा छत्र महसूस हो रहा है।
इस पद में कवि ने खुद को नीच एवं अभागा बताते हुए कहा है कि उनके नीच होने के बाबजूद भी प्रभु ने उन पर सामान भाव से कृपा बरसाई है जिससे कवि बेहद प्रसन्न हैं। संत रविदास अपने प्रभु की महिमा का वर्णन करते हुए कह रहे हैं कि संत अपने भक्तों में भेद भाव नहीं करते हैं।
वे हमेशा अपने भक्तों को एक सामान दृष्टि से देखते हैं और सभी पर बिना किसी डर के और भेदभाव के एक समान कृपा बरसाते हैं। इसके साथ ही रविदास जी कहते हैं कि प्रभु के इसी गुण के वजह से नामदेव, कबीर जैसे जुलाहे साधना जैसे कसाई, सैन जैसे नाइ एवं त्रिलोचन जैसे सामान्य व्यक्तियों को भी इतनी ख्याति प्राप्त हुई है।
और प्रभु की कृपा से उन्होंने इस संसार रूपी सागर को पार कर लिया है। इसके साथ ही इस पद की आखिरी पंक्ति में कवि ने संतों से कहा कि है प्रभु की महिमा अपरम्पार है, वह कुछ भी कर सकते हैं।
निष्कर्ष:
संत रविदास ने अपने दोहे के माध्यम से लोगों में एक सकारात्मक ऊर्जा का विस्तार किया और समाज से फैली बुराइयों को दूर करने का प्रयत्न किया है। इसके साथ ही लोगों को सत्य के मार्ग पर चलने की सीख दी है जो कि वाकई सराहनीय है। वहीं महान संत रविदास जी के दोहों के अनुसरण से लोगों के जीवन में काफी हद तक बदलाव आ सकता है और इससे ईश्वर की भक्ति के महत्व का पता चलता है।
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Educational Qualification: 1. High School Passed from M.P. Board Bhopal in 2007 with 86%. 2. Higher Secondary (Mathematics) Passed from M.P. Board Bhopal in 2009 with 81 %. (Math’s Mark 97%) 3. B.Sc. (Mathematics) Passed from M.P. Bhoj University Bhopal in 2015 with 63 %. 4. M.Sc. (Mathematics) Passed from M.P. Bhoj University Bhopal in 2017 with 61% 5. Master Of Social Work in Running from Mahatma Gandhi Chitrakoot Gramodaya Vishwavidyalaya, Satna MP Other Qualification: 1. Computer Course of Three Month (CCA) 2. BE (CS) third Sem MPCTM Collage. 3. BTC 20 Days Camp Surya Foundation from Delhi. 4. OTC in RSS second Year








