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August 10, 2025

बोधकथा - अक्रोधी और सत्यवादी युधिष्ठर akrodhee aur satyavaadee yudhishthar

प्राचीन समय में इस आर्यावर्त देश में यमुना नदी के तट पर हस्तिनापुर नाम की एक सुन्दर नगरी बसी हुई थी। एक समय राजा धृतराष्ट्र यहाँ पर राज्य करते। इनके एक सौ एक पुत्र थे, जो कौरव कहलाते थे। इनमें सबसे बड़े दुर्योधन थे। इसी प्रकार राजा धृतराष्ट्र के भाई पांडू के भी पांच पुत्र थे, जो पाण्डव कहलाते थे। इनमें सबसे बड़े युधिष्ठर थे। ये सब राजकुमार गुरु द्रोणाचार्य से पढ़ते थे।


एक बार गुरु द्रोणाचार्य ने उन सबको यह पाठ पढ़ाया की क्रोध कभी  नहीं करना चाहिए, और सदा सच बोलना चाहिए। गुरु ने आज्ञा दी कि इस पाठ को खूब याद कर कल सुनाएँ। अगले दिन गुरूजी ने सब राजकुमारों को पिछला पाठ सुनाने को कहा। बाकि सबने तो अपना पाठ सुना दिया, लेकिन युधिष्ठर ने कहा- गुरुदेव । मुझे अभी पाठ याद नहीं हुआ। गुरुजी ने कहा-अच्छा कल सुना देना।

अगले दिन फिर गुरूजी ने युधिष्ठर से पाठ पूंछा पर उसने फिर भी यही कहा- मुझे अभी पाठ याद नहीं हुआ। एक-एक करके सात दिन बीत गए। युधिष्ठर मन लगाकर पाठ याद करते रहे। अब आठवें दिन जब गुरूजी ने युधिष्ठर से पाठ सुनाने को कहा तो उन्होंने फिर वही शब्द कहे। अब तो गुरूजी के क्रोध की सीमा न रही और लगे उसे पीटने । पर युधिष्ठर ने उस दण्ड को प्रसन्न्तापूर्वक सहन किया। अन्त में जब गुरूजी का क्रोध शांत हुआ, युधिष्ठर हाथ जोड़कर कहने लगे - गुरुदेव अब मुझे पाठ का पहला भाग क्रोध कभी नहीं करना चाहिए याद हो गया है। क्योंकि आपने मुझे बहुत पीटा, पर मुझे क्रोध नहीं आया, परन्तु इसका पिछला भाग सदा सच बोलना चाहिए का अभी अभ्यास कर रहा है। जब इसे अपने जीवन में उतर लेगा, तब यह पाठ भी सुना दूँगा। सुनकर द्रोणाचार्य बड़े प्रसन्न हुए। उन्होंने मन में विचार किया जिसके इतने उत्तम विचार हैं, वह एक दिन अवश्य महान पुरुष बनेगा।

जीवन-भर युधिष्ठर ने इन दोनों व्रतों को निभाया। कभी क्रोध नहीं किया और सच ही बोलते रहे। इन्ही बातो से उन्हें धर्मराज युधिष्ठर कहते हैं।


बोधकथा - मन की एकाग्रता concentration of mind

एक दिन स्वामी विवेकानंद नदी के किनारे टहल रहे थे। उन्होंने देखा कि कुछ नवयुवक पुल पर खड़े होकर पानी की लहरों में तैर रहे गेंदों पर निशाना लगा रहे हैं।

सभी गेंदे एक धागे में बंधे हुए थे। दूसरे किनारे पर एक पत्थर बंधा हुआ था जिसके परिणाम स्वरुप वे पानी के बहाव में बह नहीं सकते थे। बड़ी देर से स्वामी जी उन नवयुवकों के असफल प्रयास को देखकर खड़े - खड़े मुस्करा रहे थे।

लहरों के कारण वे गेंदे लगातार इधर इधर हिल डुल रहे थे। अतः निशाना ठीक लगता नहीं था। वास्तव में काम बहुत ही कठिन था। एक युवक ने स्वामी जी को मुस्कराते हुए देख लिया। वह व्यंगात्मक आवाज में बोला, "आप हम पर हँस रहे हैं। मगर निशाना लगाना सरल काम नहीं है। आप में क्षमता हो तो आप ही निशाना लगाकर दिखा दीजिए।"

स्वामी विवेकानंद ने उसी स्वाभाविक ढंग से मुस्कुराते हुए कहा, "लाओ भाई, जरा मैं भी प्रयास करके देखता हूँ।"



उस नवयुवक ने आश्चर्य से देखा कि स्वामी जी ने एक-दो नहीं लगभग सभी गेंदों पर निरंतर सफल निशाने लगाकर दिखाये। अब तो युवक उनकी प्रतिभा पर चकित रह गये। सभी एक स्वर में बोले "लगता है कि आप एक सफल निशानेबाज है। स्वामी विवेकानंद के मुखमंडल पर पुनः मुस्कान थिरक उठी। वे बोले "नहीं भाई, मैंने बन्दूक अपने जीवन में पहली बार उठायी है।" फिर यह बतलाया कि, "लक्ष्य साधने की सफलता अभ्यास से अधिक मन की एकाग्रता पर निर्भर करती है।

Concentration Of Mind

One day Swami Vivekananda was strolling on the bank of a river. He saw some young men standing on a bridge aiming at the balls floating in the waves of water.

All the balls were tied to a thread. A stone was tied on the other end due to which they could not be swept away by the flow of water. For a long time Swamiji was standing and smiling seeing the unsuccessful attempts of those young men.

Due to the waves those balls were constantly moving here and there. Hence the aim was not accurate. In reality the task was very difficult. One young man saw Swamiji smiling. He said in a sarcastic voice, "You are laughing at us. But aiming is not an easy task. If you have the ability then you yourself aim and show it."

Swami Vivekananda said smiling in the same natural manner, "Let me also try brother."

That young man saw with surprise that Swamiji showed successful aiming not on one or two but on almost all the balls continuously. Now the youth were astonished at his talent. All of them said in one voice, "It seems that you are a successful marksman." A smile again danced on Swami Vivekananda's face. He said, "No brother, I have picked up a gun for the first time in my life." Then he said, "The success of hitting the target depends more on concentration of mind than practice."

August 04, 2025

पूजनीय कौन

एक मंदिर में स्थापित पत्थर प्रतिमा पर चढ़ाए गए पुष्प ने क्रोधित होकर पुजारी से कहा, तुम प्रतिदिन इस पत्थर प्रतिमा पर मुझे चढ़ाकर इसकी पूजा करते हो। वह मुझे कतई पसंद नहीं है। पूजा मेरी होनी चाहिए क्योंकि मैं कोमल, सुन्दर, सुवासित हूँ। वह तो मात्र पत्थर की मूर्ती है।

मंदिर के पुजारी ने हँसते हुए कहा, हे पुष्प, तुम कोमल, सुन्दर, सुगन्धित अवश्य हो पर तुम्हें ईश्वर ने ऐसा बनाया है। ये गुण तुम्हें सहजता से प्राप्त हुए हैं। इनके लिए तुम्हें कोई श्रम नहीं करना पड़ा है। पर देवत्व प्राप्त करना बड़ा कठिन काम है। इस देव प्रतिमा का निर्माण बड़ी कठिनाई से किया जाता है। एक कठोर पत्थर को देव प्रतिमा बनने के लिये हजारों चोटें सहनी पड़तीं हैं। चोट लगते ही अगर यह टूट के बिखर जाता तो शायद यह कभी देव प्रतिमा नहीं बन सकता था। एक बार अगर कठोर पत्थर देव प्रतिमा में ढल जाए तो लोग उसे बड़े आदर भाव से मंदिर में स्थापित कर प्रतिदिन उसकी पूजा अर्चना करते हैं। इस पत्थर की सहनशीलता ने ही इसे देव प्रतिमा के रूप में पूजनीय तथा वन्दनीय बना दिया है।

यह सुनकर पुष्प मुस्कुरा दिया। वह समझ गया की कठिन परीक्षा को सफलतापूर्वक पार करने वाला ही देवत्व प्राप्त करता है।

February 27, 2021

संत रविदास के दोहे अर्थ समेत – Ravidas ke Dohe with Meaning

 संत रविदास का दोहा नंबर 1- Ravidas ke Dohe 1

महान संत रविदास जी ने इस दोहे में इन्सान के कर्मों के महत्व के बारे में व्याख्या की है। जो लोग सोचते हैं कि कोई इंसान जन्म लेने से ही बुरा और अच्छा बन जाता है, तो यह सोचना गलत है। क्योंकि सभी इंसान एक जैसे पैदा होते हैं लेकिन इंसान के कर्म ही उसे अच्छा या बुरा बनाती है।

दोहा:

रविदास’ जन्म के कारनै, होत न कोउ नीच,
नरकूँ नीच करि डारि है, ओछे करम की कीच

रविदास जी कहते है की सिर्फ जन्म लेने से कोई नीच नहीं बन जाता है लेकिन इन्सान के कर्म ही उसे नीच बनाते है।

महान संत रविदास जी के इस दोहे से हमें यह सीख मिलती है कि हमें हमेशा अच्छे कर्म करने चाहिए क्योंकि अच्छे कर्म ही इंसान को स्वर्ग का रास्ता दिखाते हैं।

संत रविदास का दोहा नंबर 2- Ravidas ke Dohe 2

इस दोहे में संत रविदास जी ने इंसान के पवित्र ह्रदय के बारे में व्याख्या की है कि जब इंसान पूरी तरह से अपनी जिंदगी में खुश रहता है तब उसे किसी भी तरह की चिंता नहीं सताती और वह इंसान थोड़े कम में भी गुजारा कर लेता है –

 चंगा तो कठौती में गंगा

दोहे का हिन्दी में अर्थ:

महान संत रविदास जी कहते हैं कि अगर आपका मन और हृदय पवित्र है साक्षात् ईश्वर आपके हृदय में निवास करते है।

संत रविदास जी के इस दोहे से यह सीख मिलती है कि हमें अपने मन में किसी के प्रति ईर्ष्या का भाव नहीं रखना चाहिए क्योंकि साफ दिल वाले इंसान हमेशा खुश रहते हैं और अपनी जिंदगी में ऐसे काम करते हैं जो कि दूसरे को प्रेरणा दे सकें।

संत रविदास का दोहा नंबर 3- Ravidas ke Dohe 3

इस दोहे में संत रविदास जी ने यह व्याख्या की है कि जातिगत भेदभाव के अंतर से इंसान बंट चुके हैं जिन्हें तब तक एक नहीं किया जा सकता जब तक की जाति को जड़ से खत्म नहीं किया जाए, वहीं आज के समाज में कई लोग ऐसे हैं जो कि लोगों में जातिगत भेदभाव की भावना को बढ़ा रहे हैं, ऐसे लोगों के लिए संत रविदास जी का यह दोहा काफी ज्ञानवर्धक है –

जाति-जाति में जाति हैं, जो केतन के पात,
रविदास मनुष ना जुड़ सके जब तक जाति न जात

दोहा का हिन्दी में अर्थ:

महान संत रविदास जी कहते है की जिस तरह केले के पेड़ के तने को छीला जाए तो पत्ते के नीचे पत्ता फिर पत्ते के नीचे पत्ता और आखिरी में कुछ भी हासिल नहीं होता है लेकिन पूरा पेड़ नष्ट हो जाता है ठीक उसी तरह इंसानों को भी जातियों में बांट दिया गया है।

वहीं इन जातियों के बंटने से इन्सान तो अलग-अलग बंट जाता है और फिर वे भी केले के पत्तों की तरह आखिरी में खत्म हो जाते है लेकिन यह जाति खत्म नही होती है। इसलिए रविदास जी कहते है जब तक ये जाति खत्म नही होंगा तबतक इन्सान एक दूसरे से जुड़ नही सकता है या फिर एक नही हो सकता है।

संत रविदास जी के इस दोहे से हमें यह सीख मिलती है कि हमें जातिगत भेदभाव नहीं करना चाहिए और सभी को मिलजुल कर रहना चाहिए।

संत रविदास का दोहा नंबर 4- Ravidas ke Dohe 4

आज के समाज में कई लोग ऐसे भी हैं जो कि पूरी जिंदगी मोह-माया में पड़े रहते हैं और सिर्फ और सिर्फ पैसे कमाने के पीछे भागते रहते हैं न तो उन्हें रिश्तों का ध्यान होता है और न ही ऐसे लोग भगवान का ध्यान करते हैं। ऐसे ही लोगों के लिए संत रविदास जी ने अपने इस दोहे के माध्यम से बड़ी बात कही है जो कि इस प्रकार है –

हरि-सा हीरा छांड कै, करै आन की आस
ते नर जमपुर जाहिंगे, सत भाषै रविदास

दोहे का हिन्दी में अर्थ:

रविदास जी कहते हैं कि हीरे से बहुमूल्य हरी यानि ईश्वर को छोड़कर अन्य चीजों की आशा करते है उन्हें अवश्य ही नर्क जाना पड़ता है अर्थात प्रभु की भक्ति को छोड़कर इधर उधर भटकना व्यर्थ है।

हमें अपनी जिंदगी में ऐश और आराम के लिए पैसे कमाने के पीछे नहीं भागना चाहिए बल्कि ईश्वर की भक्ति में ध्यान लगाना चाहिए तभी हमें मोक्ष की प्राप्ति के लिए इधर-उधर नहीं भटकना पड़ेगा।

संत रविदास का दोहा नंबर 5- Ravidas ke Dohe 5

रविदास जी ने इस दोहे में उन लोगों के लिए सीख दी है जो लोग बिना कुछ कर्म किए ही फल की चिंता करने में लगे रहते हैं और अंत में कुछ नहीं हासिल होने पर भगवान को दोष देते हैं।

करम बंधन में बन्ध रहियो, फल की ना तज्जियो आस
कर्म मानुष का धर्म है, सत् भाखै रविदास

दोहे का हिन्दी में अर्थ:

रविदास जी कहते है की हमें हमेशा अपने कर्म में लगे रहना चाहिए और कभी भी कर्म के बदले मिलने वाले फल की आशा नही छोड़नी चाहिए क्योंकि कर्म करना हमारा धर्म है तो फल पाना भी हमारा सौभाग्य है।

संत रविदास जी के इस दोहे से हमें यह सीख मिलती है कि हमें हमेशा अच्छे कर्म करने चाहिए और कुछ हासिल करने के लिए प्रयत्न करते रहना चाहिए क्योंकि जो लोग कोशिश करते हैं उन्हें अपनी जिंदगी में तरक्की जरूर मिलती है।

संत रविदास का दोहा नंबर 6- Ravidas ke Dohe 6

इस दोहे में संत रविदास जी ने उन लोगों को सीख दी है जो लोग अपने विशालकाय शरीर या फिर ज्यादा पैसे होने पर घमंड करते हैं और अपने गुरूर में इतने डूबे रहते हैं और न ही किसी दूसरे की कदर करते हैं और ईश्वर की भक्ति की तरफ तो उनका बिल्कुल भी ध्यान नहीं होता हैं –

कह रविदास तेरी भगति दूरि है, भाग बड़े सो पावै।
तजि अभिमान मेटि आपा पर, पिपिलक हवै चुनि खावै।।

दोहे का हिन्दी में अर्थ:

रविदास जी के इस दोहे का आशय यही है कि ईश्वर की भक्ति बड़े भाग्य से प्राप्त होती है अगर आपमें थोड़ा सा भी घमंड नही है तो निश्चित ही आपका जीवन सफल रहता है ठीक वैसे ही, जैसे कि एक विशालकाय हाथी शक्कर के दानो को बिन नही सकता है लेकिन एक तुच्छ सी दिखने वाली चीटी भी शक्कर के इन दानो को आसानी से बिन लेती है इस प्रकार इंसानों को भी बडप्पन का भाव त्यागकर ईश्वर की भक्ति में अपना ध्यान लगाना चाहिए।

संत रविदास जी के इस दोहे से हमें यह सीख मिलती है कि हमें घमंड नहीं करना चाहिए क्योंकि घमंड इंसान को सफलता से असफलता की तरफ खींचता है और ईश्वर की भक्ति में अपना ध्यान लगाना चाहिए तभी हमें अपने जीवन के उद्देश्यों को हासिल करने में सफलता हासिल होगी।

रविदास का दोहा नंबर 7- Ravidas ke Dohe 7

संत रविदास जी ने अपने इस दोहे के माध्यम से यह बताने की कोशिश की है ईश्वर एक हैं, नाम अलग होने से ईश्वर की भक्ति का महत्व कम नहीं हो जाता है।

कृस्न, करीम, राम, हरि, राघव, जब लग एक न पेखा
वेद कतेब कुरान, पुरानन, सहज एक नहिं देखा

दोहे का हिन्दी में अर्थ:

रविदास जी कहते है की राम, कृष्ण, हरी, ईश्वर, करीम, राघव सब एक ही परमेश्वर के अलग अलग नाम है वेद, कुरान, पुराण आदि सभी ग्रंथो में एक ही ईश्वर का गुणगान किया गया है और सभी ईश्वर की भक्ति के लिए सदाचार का पाठ सिखाते है।

संत रविदास जी के इस दोहे से हमें यह सीख मिलती है कि हमें भगवान के अलग-अलग नामों पर नहीं पड़ना चाहिए बल्कि सच्चे मन से प्रभु की प्रार्थना करनी चाहिए क्योंकि ईश्वर एक ही है वहीं सभी ग्रंथों, कुरान, वेद और पुराणों में भी ईश्वर की भक्ति के लिए एक ही सदाचार का पाठ पढ़ाया गया है।

संत रविदास का दोहा नंबर 8- Ravidas ke Dohe 8

इस दोहे के माध्यम से महान संत रविदास जी ने खुद के बारे में यह बताने की कोशिश की है कि ईश्वर की सच्चे मन से प्रार्थना करने से उनके जीवन में काफी बदलाव आया और उनकी दोबारा उत्पत्ति मनुष्य के रूप में हुई है।

जा देखे घिन उपजै, नरक कुंड मेँ बास
प्रेम भगति सों ऊधरे, प्रगटत जन रविदास

दोहे का हिन्दी में अर्थ:

रविदास जी कहते है की जिस रविदास को देखने से लोगो को घृणा आती थी जिनका निवास नर्क कुंद के समान था ऐसे रविदास का ईश्वर की भक्ति में लीन हो जाना सच में फिर से उनकी मनुष्य के रूप में उत्पत्ति हो गयी है।

संत रविदास के इस दोहे से हमें यह सीख मिलती है कि ईश्वर की भक्ति से मनुष्य अज्ञानता से ज्ञान की तरफ अग्रसर होता है और अपने जीवन में तरक्की हासिल करता है।

संत रविदास का दोहा नंबर 9- Ravidas ke Dohe 9

इस दोहे के माध्यम से संत रविदास ने कहा है कि जो सच्चे मन से ईश्वर की भक्ति करता है उसका उद्धार होना स्वभाविक है –

रविदास कहै जाकै हदै, रहे रैन दिन राम
सो भगता भगवंत सम, क्रोध न व्यापै काम

दोहे का हिन्दी में अर्थ:

रविदास जी कहते हैं कि जिसके हृदय में रात-दिन राम समाए रहते हैं ऐसा भक्त होना राम के समान है क्योंकि फिर उसके ऊपर न तो क्रोध का असर होता है और न ही काम की भावना उस पर हावी होती है।

संत रविदास जी के इस दोहे से हमें यह सीख मिलती है कि हमें अपना ध्यान भगवान की भक्ति में लगाना चाहिए। ऐसा करने से मन शांत रहता है और इंसान हर फैसले बड़ी समझदारी से लेता है।

रविदास के पद अर्थ समेत – Ravidas ke Pad with Meaning

संत रविदास जी ने सिर्फ अपने दोहे के माध्यम से लोगों को सच्चाई के मार्ग पर चलने की ही सीख दी है बल्कि उन्होंने अपने पदों के माध्यम से लोगों में ईश्वर की भक्ति का महत्व भी समझाया और यह सीख दी कि ईश्वर की भक्ति से इंसान अपनी जिंदगी संवार सकता है और कुछ सकारात्मक तरीके से बदलाव कर सकता है –

आइए अब हम आपको संत रविदास जी के पदों के बारे में बताएंगे जो कि इस तरह हैं –

रविदास का पद नंबर 10 – Ravidas ke Pad 10

निम्नलिखित दोहे में संत रविदास जी ने भक्ति का वर्णन किया है और यह बताने की कोशिश की है कि अगर कोई भक्त सच्चे मन से ईश्वर की प्रार्थना करे तो इंसान का पूरा जीवन बदल सकता है। इस दोहे में उन्होंने खुद को भी प्रभु का दास बताया है –

पद:

अब कैसे छूटै राम नाम रट लागी।
प्रभु जी, तुम चंदन हम पानी, जाकी अँग-अँग बास समानी ।
प्रभु जी, तुम घन बन हम मोरा, जैसे चितवत चंद चकोरा ।
प्रभु जी, तुम दीपक हम बाती, जाकी जोति बरै दिन राती ।
प्रभु जी, तुम मोती हम धागा, जैसे सोनहिं मिलत सुहागा ।
प्रभु जी, तुम स्वामी हम दासा, ऐसी भक्ति करै रैदासा ॥

पद का हिन्दी में अर्थ:

प्रस्तुत पंक्तियों में कवि रविदास जी ने अपने भक्ति के भाव का वर्णन किया है। उनके मुताबिक जिस तरह प्रकृति में बहुत सारी चीजें एक दूसरे से जुड़ी रहती हैं। ठीक उसी तरह एक भक्त और भगवान् भी एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं।

आपको बता दें कि संत रविदास जी ने इस पद की पहली पंक्ति में प्रभु राम के नाम का गुण गान किया है। वे बोल रहे हैं कि अगर एक बार राम नाम रटने की लत लग जाए तो फिर वो कभी छूट नहीं सकती है।

इस पद में संत रविदास जी एक सच्चे भक्त की तुलना चंदन की लकड़ी से करते हुए कहा है कि एक सच्चा भक्त चन्दन की लकड़ी और पानी की तरह होते हैं और जब चन्दन की लकड़ी को पानी में डालकर छोड़ दिया जाता है तो उसकी सुगंध पूरे पानी में फ़ैल जाती है और पूरा पानी सुगंधित हो जाता है। ठीक उसी तरह भगवान भी अपनी सुगंध अपने भक्त के मन में छोड़ जाते हैं। जिसे सूंघकर एक भक्त सदा अपने प्रभु की भक्ति में लीन रहता है।

इस पद में आगे रविदास जी कहते हैं कि जब बारिश होने वाली होती है तो पूरे आसमान में चारों तरफ बादल घिर जाते हैं, ऐसे सुहाने मौसम में जंगल में मोर भी अपने पंख फैलाकर नाचे बिना नहीं रह सकता है, ठीक उसी तरह एक सच्चा भक्त भगवान का नाम लिए बिना नहीं रह सकता।
इस पद की तीसरी पंक्ति में संत रविदास जी कहते हैं कि जैसे एक दिए में बाती जलती रहती है, ठीक उसी तरह एक भक्त भी प्रभु की भक्ति में जलकर हमेशा प्रज्वलित होता रहता है। वहीं आगे इस पद की चौथी पंक्ति में कवि ने ईश्वर को मोती की तरह और भक्त को एक धागे की तरह बताया है, एक धागा जिसमें मोतियों को पिरोया जाता है।

इस तरह भक्त और भगवान दोनों ही एक-दूसरे के बिना अधूरे हैं और इसलिए कवि ने एक भक्त से भगवान के मिलन को सोने पर सुहागा बताया है। वहीं इस पद की आखिरी पंक्ति में संत रविदास जी ने अपनी भक्ति की व्याख्या करते हुए खुद को एक दास और प्रभु का स्वामी बताया है।

रविदास का पद नंबर 11 – Ravidas ke Pad 11

महान संत रविदास जी ने अपने इस पद में भगवान की महिमा का वर्णन किया है, उन्होंने कहा कि जो भी भक्त सच्चे मन से प्रभु की आराधना करता है, उसे तरक्की जरूर हासिल होती है क्योंकि भगवान अपने हर भक्त पर सामान भाव से कृपा करते हैं, बिना किसी भेदभाव के प्रभु कृपा करते हैं और अपने भक्तों का ख्याल रखते हैं।

कवि ने इस पद में खुद को इस पद में नीच और अभागा बताया है। इसके साथ ही उन्होंने यह भी बताया कि भगवान ने उन जैसे अभागे पर भी अपनी कृपा बरसाई है जिससे वह खुशी से फूले नहीं समां रहे हैं –

पद:

ऐसी लाल तुझ बिनु कउनु करै।
गरीब निवाजु गुसईआ मेरा माथै छत्रु धरै।।
जाकी छोति जगत कउ लागै ता पर तुहीं ढरै।
नीचहु ऊच करै मेरा गोबिंदु काहू ते न डरै॥
नामदेव कबीरु तिलोचनु सधना सैनु तरै।
कहि रविदासु सुनहु रे संतहु हरिजीउ ते सभै सरै॥

पद का हिन्दी में अर्थ:

संत रविदास जी ने इस पद में प्रभु की कृपा एवं महिमा का वर्णन करते हुए कहा है कि इस पूरी दुनिया में प्रभु से बड़ा दयालु और कृपालु कोई और नहीं है और वह गरीबों पर अपनी कृपा बरसाने वाले और दिन – दुखियों की सामान भाव से मद्द करने वाले हैं।

इसके अलावा संत रविदास जी ने इस पद में यह भी कहा है कि भगवान सभी को एक सामान भाव से देखते हैं और छूत-अछूत में कोई भेदभाव नहीं रखते हैं और इसी वजह से कवि रविदास जी इस पद में यह कह रह हैं कि उनके अछूत होने के बाद भी उन पर प्रभु ने असीम कृपा बरसाई है। वहीं प्रभु के इस कृपा की वजह से कवि को अपने माथे पर राजाओं जैसा छत्र महसूस हो रहा है।

इस पद में कवि ने खुद को नीच एवं अभागा बताते हुए कहा है कि उनके नीच होने के बाबजूद भी प्रभु ने उन पर सामान भाव से कृपा बरसाई है जिससे कवि बेहद प्रसन्न हैं। संत रविदास अपने प्रभु की महिमा का वर्णन करते हुए कह रहे हैं कि संत अपने भक्तों में भेद भाव नहीं करते हैं।

वे हमेशा अपने भक्तों को एक सामान दृष्टि से देखते हैं और सभी पर बिना किसी डर के और भेदभाव के एक समान कृपा बरसाते हैं। इसके साथ ही रविदास जी कहते हैं कि प्रभु के इसी गुण के वजह से नामदेव, कबीर जैसे जुलाहे साधना जैसे कसाई, सैन जैसे नाइ एवं त्रिलोचन जैसे सामान्य व्यक्तियों को भी इतनी ख्याति प्राप्त हुई है।

और प्रभु की कृपा से उन्होंने इस संसार रूपी सागर को पार कर लिया है। इसके साथ ही इस पद की आखिरी पंक्ति में कवि ने संतों से कहा कि है प्रभु की महिमा अपरम्पार है, वह कुछ भी कर सकते हैं।

निष्कर्ष:

संत रविदास ने अपने दोहे के माध्यम से लोगों में एक सकारात्मक ऊर्जा का विस्तार किया और समाज से फैली बुराइयों को दूर करने का प्रयत्न किया है। इसके साथ ही लोगों को सत्य के मार्ग पर चलने की सीख दी है जो कि वाकई सराहनीय है। वहीं महान संत रविदास जी के दोहों के अनुसरण से लोगों के जीवन में काफी हद तक बदलाव आ सकता है और इससे ईश्वर की भक्ति के महत्व का पता चलता है।

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February 26, 2021

सदा जवान कैसे रहें? अपनी उम्र कैसे टालें? युवा आनंद को कैसे बरकरार रखा जाए?

 हम सभी एक ऐसे युग में रहते हैं, जो युवा दिल के हैं। दिन-प्रतिदिन बेहद तेज होता जा रहा जीवन हमें शारीरिक रूप से युवा बने रहने के लिए भी कहता है। दिल में युवा, मन में युवा और आपके शरीर में युवा अस्तित्व का सिद्धांत बन गया है।


            फिर भी हमारे जीवन के हर दिन के साथ हमारी उम्र बढ़ती जाती है। वास्तव में हमारे चारों ओर की दुनिया की तेज गति हमें तेजी से उम्र देती है। लेकिन, हमारी युवा शक्ति को बनाए रखना महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह केवल युवा जुनून और ऊर्जा के साथ है कि हम सफलता की दिशा में काम कर सकते हैं, एक शांतिपूर्ण, स्वस्थ जीवन का आनंद ले सकते हैं, खुद को सेक्स के आनंद में लिप्त कर सकते हैं और खुद को खुश रख सकते हैं।

सदा जवान कैसे रहें? अपनी उम्र कैसे टालें? युवा आनंद को कैसे बरकरार रखा जाए? भावुक और ऊर्जावान कैसे बने रहें।

यहां मैं आपको हमेशा के लिए युवा रखने के लिए छह चरणों को रेखांकित करता हूं - कदम, यदि आप नियमित रूप से पालन करते हैं तो यह सुनिश्चित करेगा कि आप दिल में युवा, मन में युवा और आपके शरीर में युवा रहेंगे। 


1-  एक कदम: अपने आप को युवा और जोरदार जीवन जीने की कल्पना करो। अपने आप को विभिन्न परिस्थितियों में देखें, जिसमें युवा लिप्त हैं। यह डिस्को में एक जंगली रात, फुटबॉल का एक जंगली खेल हो सकता है, उस व्यक्ति के साथ रोमांस कर सकता है जिसे आप प्यार करते हैं - यह कुछ भी हो सकता है। बस युवा क्रिया में खुद को केंद्रित करें।

2-  चरण दो: आपके द्वारा खुद के लिए बनाई गई तस्वीर आपके दिमाग में मौजूद विशिष्ट प्रभावों का उत्पादन करती है। यही है, अगर आपको लगता है कि आप बूढ़े हो रहे हैं और समय के पीछे गिर रहे हैं, तो डिस्को में एक नृत्य का आनंद लें जो आपको समय के साथ युवावस्था तक बनाए रखता है। यदि आप बूढ़े और झुर्रियों वाले हैं और युवा दिखना चाहते हैं, तो अपने आप को चिकनी, कोमल, झुर्रियों रहित त्वचा के साथ तस्वीर दें।


3-  चरण तीन: अपने आप को बेहद सतर्क, एथलेटिक और युवा के रूप में देखें। अपने आप को उन आंदोलनों में कल्पना करें जो आपने किशोरावस्था के दौरान स्वतंत्र रूप से किए थे।

यह एक बहुत ही महत्वपूर्ण दृश्य है। अनिश्चित काल के लिए सप्ताह में कम से कम दो बार इसका अभ्यास करें। आपका उद्देश्य रचनात्मक दृश्य की शक्ति का उपयोग करके अपने शरीर को संरक्षित करना है। इस प्रकार, यह एक जीवन भर का कार्यक्रम है जिसका उद्देश्य आपके युवा शक्ति को हमेशा, कभी भी, कहीं पर भी जगाना है।

4-  चरण चार: यदि आप किसी भी बुढ़ापे की बीमारी से पीड़ित हैं, तो यहां बताए गए चरणों के साथ स्वस्थ जीवन जीने के लिए दृश्यों को शामिल करें। आप अपने स्वास्थ्य में एक उल्लेखनीय सुधार देखेंगे।

5-   स्टेप फाइव: अपनी सभी इंद्रियों - दृष्टि, ध्वनि, गंध, स्वाद और स्पर्श को एक साथ लाएं। उनमें से प्रत्येक को बेहतर बनाने के लिए अपने दिमाग को निर्देशित करें। खुद की तस्वीरों की कल्पना करें जहाँ आप अधिक सुनते हैं, बेहतर स्वाद लेते हैं, अच्छी तरह से देखते हैं, उचित गंध लेते हैं और स्पर्श करने के लिए कामुक हो जाते हैं।


हर दो दिन में कम से कम एक बार उनका अभ्यास करें। आप देखेंगे कि आपकी जागरूकता उन सभी की तुलना में बेहतर है जो आपकी उम्र के हैं।

6-  चरण छह: अपने आप को अंतहीन ऊर्जा के समुद्र में कल्पना करें। पानी गर्म और आरामदायक है। आकाश उज्ज्वल और धूप है। ताज़ा पानी के माध्यम से तैरना। तैरने का आनंद लें। अपने पैरों को खींचो; पानी के माध्यम से धक्का, ऊर्जा के रूप में आप लिफाफे।


पानी से बाहर आओ और अपने आप को एक बड़े, नरम तौलिया के साथ सूखें। अभी आप ताज़े हैं। आप ऊर्जा से भरे हुए हैं। आपको यह भी लगता है कि आप में ऊर्जा ने आपके शरीर और हड्डियों को बदल दिया है। बुढ़ापे के सभी दर्द और दर्द गायब हो गए हैं।

अब आप एक नए आदमी हैं। आप युवा हैं, आप में एक भावुक जोश के साथ ऊर्जावान हैं। आप मन, शरीर और आत्मा में युवा हैं। अपनी जवानी का आनंद लें।

दो साल के विश्व विद्यालय का सही मूल्य The True Value Of A Two Year College

 दो साल के विश्व विद्यालय  का सही मूल्य

        इस देश में उच्च शिक्षा तेजी से एक लक्जरी के बजाय व्यवसाय समुदाय में एक आवश्यकता बन रही है। एक समय था जब हाई स्कूल की शिक्षा प्राप्त करने वालों के पास अभी भी अपने और अपने परिवार के लिए एक बेहतर दुनिया बनाने का अवसर था। वे दिन तेजी से अतीत के एक और मरने वाले अंगारे बन रहे हैं। यदि आप अपने जीवनकाल के दौरान महत्वपूर्ण कमाई की संभावना रखते हैं तो आप अपनी सीखने की क्षमता और आपके द्वारा प्राप्त शिक्षा के स्तर से लगभग पूरी तरह से सीमित हैं।

        अच्छी खबर यह है कि जब शिक्षा की बात आती है, तो आपके पास सभी या कुछ भी नहीं होता है। जब आप उच्च शिक्षा के लिए आते हैं, तब आप बच्चे के कदम उठा सकते हैं। यदि आपके पास अपने क्षेत्र में एक सामुदायिक कॉलेज है, तो यह आपके जीवन में किसी भी स्तर पर आपके कॉलेज की शिक्षा शुरू करने के लिए सबसे बड़े संसाधनों में से एक है। अधिकांश सामुदायिक कॉलेज दिन और शाम के दौरान कई बार कक्षाएं देते हैं, यहां तक ​​कि शनिवार को भी विभिन्न उम्र और पृष्ठभूमि के छात्रों को समायोजित करने के लिए।

           सामुदायिक कॉलेज भी आपके सीखने की खोज को एक ऐसे तरीके से शुरू करने का एक शानदार अवसर प्रदान करते हैं जो एक पूर्ण-विकसित विश्वविद्यालय की तुलना में औसत नागरिक के लिए अधिक आसानी से सस्ती है। ये कॉलेज काफी हद तक कम्यूटर कॉलेज हैं, हालांकि कई ऐसे हैं जो छात्रों को एक ही या बहुत ही समान विशेषाधिकारों के लिए अधिकांश प्रमुख विश्वविद्यालयों के प्रभार से बहुत कम कीमत पर कॉलेज परिसर में रहने का अनुभव देते हैं।

            सामुदायिक कॉलेज आपको अपने विकल्पों का पता लगाने की अनुमति देते हैं यदि आप वास्तव में यह सुनिश्चित नहीं करते हैं कि प्रक्रिया के लिए इतनी अधिक कीमत चुकाए बिना आप अपनी शिक्षा के लिए क्या दिशा चाहते हैं। यदि आप जानते हैं कि आप जिस कैरियर मार्ग को लेना चाहते हैं वह आपको दो साल का डिग्री प्रोग्राम मिल सकता है जो आपको स्कूल से बाहर कर सकता है और कैरियर में बहुत जल्द चार साल के कार्यक्रम की अनुमति देगा। यदि वह आपके लिए अच्छी खबर नहीं है, तो दो साल के अध्ययन के कई कार्यक्रम जो सामुदायिक कॉलेज स्तर पर पेश किए जाते हैं, विश्वविद्यालय स्तर पर स्नातक डिग्री कार्यक्रमों में बहुत आसानी से स्थानांतरित हो सकते हैं।

            सामुदायिक कॉलेज कई लोगों के लिए एक उत्कृष्ट शुरुआत प्रदान करते हैं, जो उच्च शिक्षा की मांग कर रहे हैं, चाहे वे अपने करियर को आगे बढ़ाएं या जीवन में व्यक्तिगत स्तर पर पूर्णता पाएं। व्यावसायिक क्षेत्रों के साथ-साथ अकादमिक क्षेत्रों में कई अद्भुत कार्यक्रम हैं जिन्हें खोजा जा सकता है और सामुदायिक कॉलेज स्तर पर अध्ययन किया जा सकता है।

            हाई स्कूल के छात्रों को स्नातक करने के लिए सामुदायिक कॉलेज छात्रों को संस्कृति के झटके से गुजरने के बिना हाई स्कूल से कॉलेज में समायोजन में आसानी करते हैं जो कुछ विश्वविद्यालयों के माध्यम से छात्रों को डाल सकते हैं। आप पाएंगे कि अक्सर छात्रों के लिए सामुदायिक कॉलेज स्तर पर शैक्षिक और सामाजिक जरूरतों को पूरा करने के लिए कई अवसर होते हैं, जो एक सामुदायिक कॉलेज शिक्षा को आगे बढ़ाने में रुचि रखते हैं।

            आपको यह भी पता लगाना चाहिए कि सामुदायिक कॉलेज बजट के लिए बहुत आसान होते हैं जब यह आपके व्यक्तिगत कॉलेज शिक्षा या आपके बच्चों के शैक्षिक खर्चों के लिए अलग से धन और बचत की स्थापना के लिए आता है। उन्हें दो साल के लिए एक सामुदायिक कॉलेज में भाग लेने के बाद एक विश्वविद्यालय में स्थानांतरित करने से बहुत सारे पैसे बचाए जा सकते हैं और आपको एक छोटा सा दिमाग प्रदान किया जा सकता है कि आपके बच्चे अभी भी एक उत्कृष्ट स्तर की शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं।

            गंभीरता से, यदि आप एक उत्कृष्ट मूल्य की तलाश कर रहे हैं, जब यह शिक्षा की बात आती है तो आप खुद या अपने बच्चों को एक असंतुष्ट करेंगे यदि आप विश्वविद्यालय की जीवन शैली में डुबकी लगाने और गोताखोरी करने से पहले अपने क्षेत्र में सामुदायिक कॉलेज के विकल्पों की जांच नहीं करते हैं। आप पाएंगे कि सामुदायिक कॉलेज अक्सर परिचयात्मक कक्षाओं के लिए समान स्तर की शिक्षा प्रदान करते हैं, जो पहले और दूसरे वर्ष के कॉलेज के छात्र अक्सर लेते हैं, वे पैसे के लिए बहुत बेहतर मूल्य हैं, और वे उन लोगों के लिए एक उत्कृष्ट मूल्य हैं, जो करतब दिखाने की कोशिश कर रहे हैं परिवार और काम जिम्मेदारियों के साथ उनकी शिक्षा।

February 25, 2021

शनि की काली मूर्ति और पीपल के वृक्ष की पूजा का महत्व

शनि की काली मूर्ति और पीपल वृक्ष की पूजा का यही धार्मिक

*💐💐एक अनोखी सत्य कथा💐💐*

            श्मशान में जब महर्षि दधीचि के मांसपिंड का दाह संस्कार हो रहा था तो उनकी पत्नी अपने पति का वियोग सहन नहीं कर पायीं और पास में ही स्थित विशाल पीपल वृक्ष के कोटर में 3 वर्ष के बालक को रख स्वयम् चिता में बैठकर सती हो गयीं। इस प्रकार महर्षि दधीचि और उनकी पत्नी का बलिदान हो गया किन्तु पीपल के कोटर में रखा बालक भूख प्यास से तड़प तड़प कर चिल्लाने लगा।जब कोई वस्तु नहीं मिली तो कोटर में गिरे पीपल के गोदों(फल) को खाकर बड़ा होने लगा। कालान्तर में पीपल के पत्तों और फलों को खाकर बालक कि जीवन येन केन प्रकारेण सुरक्षित रहा।
        
शनि देव जी की काली मूर्ति 
एक दिन देवर्षि नारद वहाँ से गुजरे। नारद ने पीपल के कोटर में बालक को देखकर उसका परिचय पूंछा-
नारद- बालक तुम कौन हो ?
बालक- यही तो मैं भी जानना चाहता हूँ ।
नारद- तुम्हारे जनक कौन हैं ?
बालक- यही तो मैं जानना चाहता हूँ ।
           तब नारद ने ध्यान धर देखा।नारद ने आश्चर्यचकित हो बताया कि  हे बालक ! तुम महान दानी महर्षि दधीचि के पुत्र हो। तुम्हारे पिता की अस्थियों का वज्र बनाकर ही देवताओं ने असुरों पर विजय पायी थी। नारद ने बताया कि तुम्हारे पिता दधीचि की मृत्यु मात्र 31 वर्ष की वय में ही हो गयी थी।
बालक- मेरे पिता की अकाल मृत्यु का कारण क्या था ?
नारद- तुम्हारे पिता पर शनिदेव की महादशा थी।
बालक- मेरे ऊपर आयी विपत्ति का कारण क्या था ?
नारद- शनिदेव की महादशा।
 इतना बताकर देवर्षि नारद ने पीपल के पत्तों और गोदों को खाकर जीने वाले बालक का नाम पिप्पलाद रखा और उसे दीक्षित किया।
            नारद के जाने के बाद बालक पिप्पलाद ने नारद के बताए अनुसार ब्रह्मा जी की घोर तपस्या कर उन्हें प्रसन्न किया। ब्रह्मा जी ने जब बालक पिप्पलाद से वर मांगने को कहा तो पिप्पलाद ने अपनी दृष्टि मात्र से किसी भी वस्तु को जलाने की शक्ति माँगी।ब्रह्मा जी से वर्य मिलने पर सर्वप्रथम पिप्पलाद ने शनि देव का आह्वाहन कर अपने सम्मुख प्रस्तुत किया और सामने पाकर आँखे खोलकर भष्म करना शुरू कर दिया।शनिदेव सशरीर जलने लगे। ब्रह्मांड में कोलाहल मच गया। सूर्यपुत्र शनि की रक्षा में सारे देव विफल हो गए। सूर्य भी अपनी आंखों के सामने अपने पुत्र को जलता हुआ देखकर ब्रह्मा जी से बचाने हेतु विनय करने लगे।अन्ततः ब्रह्मा जी स्वयम् पिप्पलाद के सम्मुख पधारे और शनिदेव को छोड़ने की बात कही किन्तु पिप्पलाद तैयार नहीं हुए।ब्रह्मा जी ने एक के बदले दो वर्य मांगने की बात कही। तब पिप्पलाद ने खुश होकर निम्नवत दो वरदान मांगे-
पीपल के वृक्ष की पुजा करती महिला
1- जन्म से 5 वर्ष तक किसी भी बालक की कुंडली में शनि का स्थान नहीं होगा।जिससे कोई और बालक मेरे जैसा अनाथ न हो।
2- मुझ अनाथ को शरण पीपल वृक्ष ने दी है। अतः जो भी व्यक्ति सूर्योदय के पूर्व पीपल वृक्ष पर जल चढ़ाएगा उसपर शनि की महादशा का असर नहीं होगा।
           ब्रह्मा जी ने तथास्तु कह वरदान दिया।तब पिप्पलाद ने जलते हुए शनि को  अपने ब्रह्मदण्ड से उनके पैरों पर आघात करके उन्हें मुक्त कर दिया । जिससे शनिदेव के पैर क्षतिग्रस्त हो गए और वे पहले जैसी तेजी से चलने लायक नहीं रहे।अतः तभी से शनि *"शनै:चरति य: शनैश्चर:"* अर्थात जो धीरे चलता है वही शनैश्चर है, कहलाये और शनि आग में जलने के कारण काली काया वाले अंग भंग रूप में हो गए।
पीपल का वृक्ष
       *सम्प्रति शनि की काली मूर्ति और पीपल वृक्ष की पूजा का यही धार्मिक हेतु है।* आगे चलकर पिप्पलाद ने प्रश्न उपनिषद की रचना की,जो आज भी ज्ञान का अकूत भंडार है।
*सदैव प्रसन्न रहिये!!*
*जो प्राप्त है-पर्याप्त है!!*
      🙏🌹Jay Sri ram🌹🙏

December 28, 2020

स्वामी विवेकानंद की जीवनी | Swami Vivekananda Biography In Hindi

स्वामी विवेकानंद की जीवनी  

प्राचीन काल से भारत ने दुनिया को बहुत सारे संत और आध्यात्मिक नेता प्रदान किए हैं। जिनमे स्वामी विवेकानन्द का नाम भी शामिल है। जिन्होंने अपनी दृष्टि और ज्ञान से दुनिया को मंत्रमुग्ध कर दिया है।

उनमें से सबसे प्रसिद्ध आध्यात्मिक नेता, स्वामी विवेकानंद हैं। जो दुनिया में हिंदुत्व के सकारात्मक पक्ष को फैलाने और हिंदुत्व को जीवन के एक मार्ग के रूप में पेश करने के लिए जाने जाते हैं।

आज हम आपको इस आर्टिकल के माध्यम से स्वामी विवेकानंद के जीवन से जुड़ी  सारी बातो के बारे में जिक्र करेंगे। स्वामी विवेकानंद के जीवन से जुड़े कई विचार भी इस आर्टिकल के माध्यम से आप तक पहुचायेंगे।

स्वामी विवेकानंद की प्रारंभिक जीवन और शिक्षा

स्वामी विवेकानंद, जो अपने प्रारंभिक जीवन में नरेंद्र नाथ दत्ता के नाम से जाने जाते थे। उनका जन्म  12 जनवरी 1863 को कोलकाता में एक संपन्न परिवार में हुआ था। उनके पिता विश्वनाथ दत्त कई विषयों में एक सफल वकील थे और उनकी माँ भुवनेश्वरी  गहरी भक्ति मजबूत चरित्र और अन्य गुणों से संपन्न थीं।

वह बचपन से ही असाधारण थे और संगीत, जिमनास्टिक और पढ़ाई में उत्कृष्ट थे। पढ़ाई में स्वामी विवेकानंद सुरुआत से भी बहुत होशियार थे। वे हमेशा अपनी पढ़ाई को प्रैक्टिकल के तौर पर समझते थे।

उन्होंने अपनी पढ़ाई के साथ-साथ पहले मेट्रोपॉलिटन संस्थान और बाद में कलकत्ता के प्रेसीडेंसी कॉलेज में उत्कृष्ट प्रदर्शन किया। जब उन्होंने कॉलेज से स्नातक किया, तब तक उन्होंने विभिन्न विषयों का एक विशाल ज्ञान प्राप्त कर लिया था।

उन्होंने एक ओर भगवद गीता और उपनिषदों जैसे हिंदू धर्मग्रंथों का अध्ययन किया, वहीं दूसरी ओर उन्होंने डेविड ह्यूम, जोहान गोटलिब फिच्ते और हर्बर्ट स्पायर द्वारा पश्चिमी दर्शन, इतिहास और आध्यात्मिकता का भी अध्ययन किया।

स्वामी विवेकानंद की आध्यात्मिक जागृति

1884 में, नरेंद्रनाथ ने अपने पिता की मृत्यु के कारण काफी आर्थिक तंगी का सामना किया। क्योंकि उन्हें अपनी माँ और छोटे भाई-बहनों का आर्थिक रूप से समर्थन करना था। उन्होंने रामकृष्ण से अपने परिवार के आर्थिक कल्याण के लिए देवी से प्रार्थना करने के लिए कहा।

रामकृष्ण के सुझाव पर वह खुद मंदिर में प्रार्थना करने गए। लेकिन एक बार जब उन्होंने देवी का सामना किया। तो वह धन माँगने में सक्षम नहीं थे, इसके बजाय उन्होंने ‘विवेक’ (विवेक) और ‘बैराग्य’ (समावेश) का आशीर्वाद मांगा। उस दिन नरेंद्रनाथ के पूर्ण आध्यात्मिक जागरण को चिह्नित किया गया और वह आध्यात्मिक पथ पर अग्रसर हुए।

विश्व धर्म संसद में व्याख्यान

अपने दौरे के दौरान, उन्हें 1893 में शिकागो, अमेरिका में आयोजित होने वाले विश्व धर्म संसद के बारे में पता चला। वह भारत, हिंदू धर्म और उनके गुरु श्री रामकृष्ण के दर्शन का प्रतिनिधित्व करने के लिए बैठक में भाग लेने के लिए उत्सुक थे। शिकागो जाने के रास्ते में उन्हें बहुत कठिन कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। लेकिन उनकी आत्माएं हमेशा की तरह अदम्य रहीं।

11 सितंबर 1893 को, जब समय आया, उन्होंने मंच लिया और अपनी प्रारंभिक पंक्ति “मेरे भाइयों और अमेरिका की बहनों” के साथ सभी को चौंका दिया।

उन्होंने शुरुआती वाक्यांश के लिए दर्शकों से एक स्थायी ओवेशन प्राप्त किया। उन्होंने हिंदू धर्म को विश्व धर्मों के मानचित्र पर रखकर वेदांत के सिद्धांतों और उनके आध्यात्मिक महत्व का वर्णन किया।

उन्होंने अमेरिका में अगले ढाई साल बिताए और 1894 में न्यूयॉर्क के वेदांत सोसाइटी की स्थापना की। उन्होंने पश्चिमी दुनिया को वेदांत और हिंदू अध्यात्मवाद के सिद्धांतों का प्रचार करने के लिए यूनाइटेड किंगडम की यात्रा भी की।

शिक्षण और रामकृष्ण मिशन

विवेकानंद 1897 में भारत लौट आए। देश भर में व्याख्यान देने के बाद वे कलकत्ता पहुँचे और 1 मई, 1897 को कलकत्ता के पास बेलूर मठ में रामकृष्ण मिशन की स्थापना की। रामकृष्ण मिशन के लक्ष्य कर्म योग के आदर्शों पर आधारित थे और इसका प्राथमिक उद्देश्य देश की गरीब और संकटग्रस्त आबादी की सेवा करना था।

रामकृष्ण मिशन ने स्कूल, कोलाज और अस्पतालों की स्थापना और संचालन, सम्मेलन, सेमिनार और कार्यशालाओं के माध्यम से वेदांत के व्यावहारिक सिद्धांतों का प्रचार, देश भर में राहत और पुनर्वास कार्य शुरू करने जैसे विभिन्न सामाजिक कार्य किए।

स्वामी विवेकानंद की मृत्यु

स्वामी विवेकानंद ने भविष्यवाणी की थी कि वे चालीस साल की उम्र तक नहीं रहेंगे। 4 जुलाई, 1902 को, उन्होंने बेलूर मठ में अपने दिनों के काम के बारे में जाना, विद्यार्थियों को संस्कृत व्याकरण पढ़ाया।

वह शाम को अपने कमरे में सेवानिवृत्त हो गया और लगभग 9 बजे ध्यान के दौरान उसकी मृत्यु हो गई। कहा जाता है कि उसे ‘महासमाधि’ प्राप्त हुई और महान संत का गंगा नदी के तट पर अंतिम संस्कार किया गया।

December 01, 2020

रावण

रावण...
     रावण को भाई के रूप में वही पसन्द कर सकती है जिसका चरित्र सूर्पनखा जैसा हो। जो वन-वन घूम कर दूसरी स्त्रियों का पति चुराती हो। या जो किसी सुन्दर स्त्री को देखे तो अपने भाई को उसका हरण करने के लिए प्रेरित करे। ऐसी स्त्रियाँ कभी आदर्श नहीं हो सकतीं।
     रावण को भाई के रूप में वही पुरुष पसन्द करता है जिसका चरित्र कुंभकर्ण जैसा हो। जो सज्जन होने के बावजूद भाई के कुकर्मों के समय आंख बंद कर ले। ऐसे लोग कभी अनुकरणीय नहीं हो सकते।
     रावण को पति के रूप में वही स्त्री पसन्द कर सकती है, जो अपने पति को हजार टुकड़ों में बंटते देख सकती हो। जो देख सकती हो कि उसका पति यक्ष, गन्धर्व, नाग, असुर, राक्षस, यवन सभी जाति की स्त्रियों का हरण करे और बलपूर्वक अपनी पत्नी बना कर रखे। जो सहन कर सकती हो कि उसका पति उसकी किसी भी बात को न माने... वह गिड़गिड़ाती रहे, पर उसका पति उसकी बात अनसुनी कर के पाप करता रहे। 
     रावण को मित्र के रूप में वही पसन्द कर सकते हैं जिनका चरित्र बाली के जैसा हो। जो अपने छोटे भाई की स्त्री को बलपूर्वक छीनने में लज्जा का अनुभव नहीं करता हो। जो तारा जैसी विदुषी पत्नी की भी कोई बात नहीं मानता हो। ऐसे लोग भी सम्मान के योग्य नहीं होते।
      रावण को अपना नायक वही मान सकते हैं जिन्हें न धर्म का ज्ञान है, न वेद का। रावण उन राक्षसों का नायक था जो ऋषियों के हवन कुंड में हड्डियां डालते थे, जो ऋषियों को मार कर खा जाते थे, जो मनुष्यों को जीने नहीं देते थे। रावण ऐसे ही अमानुषों का नायक हो सकता है।
       रावण को एक आदर्श पुत्र मानने वाले मूर्ख ही हैं, क्योंकि रावण के कुकर्मों के कारण स्वयं उसके पिता ने उसका त्याग कर दिया था। जिस व्यक्ति के कारण उसका लज्जित पिता नगर छोड़ दे, वह और कुछ भी हो आदर्श पुत्र नहीं हो सकता।
      रावण ब्राह्मणों का नायक न था, न है, न होगा... ब्राह्मणों के आदर्श हैं वे गुरु वशिष्ठ जिन्होंने राजकुमार राम को मर्यादा पुरुषोत्तम राम बनाया। ब्राह्मणों के नायक हैं वे दधीचि, जिन्होंने धर्म की रक्षा के लिए अपनी हड्डियां दान कर दी। आधुनिक काल मे भी ब्राह्मणों के नायक चाणक्य, वर्षकार, पतंजलि, शंकराचार्य, या करपात्री जी महाराज हैं, कोई रावण नहीं है। रावण उन ब्राह्मण वंशियो को ही प्रिय हो सकता है जिन्होंने धर्म का त्याग कर वामपंथ स्वीकार किया हो, वे इतने महत्वपूर्ण नहीं कि वे ब्राह्मणों को दिशा दें। मैं तो उन्हें ब्राह्मण ही नहीं मानता।
      भारतीय लोक रावण को हर विजया के दिन बुराई के प्रतीक के रूप में जलाता रहा है, और जलाता रहेगा। आज भी, और हजार वर्ष बाद भी... लोक किताबी विचारकों की बात नहीं सुनता, उसकी गोद में रोज हजारों चार्वाक, मार्क्स, कन्फ्यूशियस जन्म लेते हैं और मर जाते हैं। लोक अपने ही गति से मुस्कुराता हुआ चलता रहता है। यही भारत है...

सर्वेश तिवारी श्रीमुख
गोपालगंज, बिहार।

November 22, 2020

वीर रानी लक्ष्मी बाई Rani laxmi jivani

भारत माता की जय हो
🚩जय भवानी🚩

❗रानी लक्ष्मीबाई❗
(जन्म-19 नवंबर, 1835; मृत्यु-17 जून,1858) मराठा शासित झाँसी राज्य की रानी और 1857 के प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की वीरांगना थीं। बलिदानों की धरती भारत में ऐसे-ऐसे वीरों ने जन्म लिया है, जिन्होंने अपने रक्त से देश प्रेम की अमिट गाथाएं लिखीं। यहाँ की ललनाएं भी इस कार्य में कभी किसी से पीछे नहीं रहीं, उन्हीं में से एक का नाम है- झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई। उन्होंने न केवल भारत की बल्कि विश्व की महिलाओं को गौरवान्वित किया। उनका जीवन स्वयं में वीरोचित गुणों से भरपूर, अमर देशभक्ति और बलिदान की एक अनुपम गाथा है।
❗रानी लक्ष्मीबाई मराठा शासित झांसी की रानी और भारत की स्वतंत्रता संग्राम की प्रथम वनिता थीं। भारत को दासता से मुक्त करने के लिए सन् 1857 में बहुत बड़ा प्रयास हुआ। यह प्रयास इतिहास में भारत का प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम या सिपाही स्वतंत्रता संग्रामकहलाता है।
❗अंग्रेज़ों के विरुद्ध रणयज्ञ में अपने प्राणों की आहुति देने वाले योद्धाओं में वीरांगना महारानी लक्ष्मीबाई का नाम सर्वोपरी माना जाता है। 1857 में उन्होंने भारत के स्वतंत्रता संग्राम का सूत्रपात किया था। अपने शौर्य से उन्होंने अंग्रेज़ों के दाँत खट्टे कर दिए थे।
❗अंग्रेज़ों की शक्ति का सामना करने के लिए उन्होंने नये सिरे से सेना का संगठन किया और सुदृढ़ मोर्चाबंदी करके अपने सैन्य कौशल का परिचय दिया था।

❗जीवन परिचय❗
रानी लक्ष्मीबाई का जन्म 19 नवंबर, 1835 को काशी के पुण्य व पवित्र क्षेत्र असीघाट,वाराणसी में हुआ था। इनके पिता का नाम 'मोरोपंत तांबे' और माता का नाम 'भागीरथी बाई' था। इनका बचपन का नाम 'मणिकर्णिका' रखा गया परन्तु प्यार से मणिकर्णिका को 'मनु' पुकारा जाता था। मनु की अवस्था अभी चार-पाँच वर्ष ही थी कि उसकी माँ का देहान्त हो गया। पिता मोरोपंत तांबे एक साधारण ब्राह्मण और अंतिम पेशवा बाजीराव द्वितीय के सेवक थे। माता भागीरथी बाई सुशील, चतुर और रूपवती महिला थीं। अपनी माँ की मृत्यु हो जाने पर वह पिता के साथ बिठूर आ गई थीं। यहीं पर उन्होंने मल्लविद्या, घुड़सवारी और शस्त्रविद्याएँ सीखीं। चूँकि घर में मनु की देखभाल के लिए कोई नहीं था इसलिए उनके पिता मोरोपंत मनु को अपने साथ बाजीराव के दरबार में ले जाते थे जहाँ चंचल एवं सुन्दर मनु ने सबका मन मोह लिया था। बाजीराव मनु को प्यार से 'छबीली' बुलाते थे।

❗शिक्षा❗
पेशवा बाजीराव के बच्चों को पढ़ाने के लिए शिक्षक आते थे। मनु भी उन्हीं बच्चों के साथ पढ़ने लगी। सात साल की उम्र में ही लक्ष्मीबाई ने घुड़सवारी सीखी। साथ ही तलवार चलाने में, धनुर्विद्या में निष्णात हुई। बालकों से भी अधिक सामर्थ्य दिखाया। बचपन में लक्ष्मीबाई ने अपने पिता से कुछ पौराणिक वीर गाथाएँ सुनीं। वीरों के लक्षणों व उदात्त गुणों को उसने अपने हृदय में संजोया। इस प्रकार मनु अल्पवय में ही अस्त्र-शस्त्र चलाने में पारंगत हो गई। अस्त्र-शस्त्र चलाना एवं घुड़सवारी करना मनु के प्रिय खेल थे।

❗विवाह❗
मनु विवाह योग्य हो गयी। इनका विवाह सन् 1842 में झाँसी के राजा गंगाधर राव निवालकर के साथ बड़े ही धूम-धाम से सम्पन्न हुआ। विवाह के बाद इनका नाम लक्ष्मीबाई रखा गया। इस प्रकार काशी की कन्या मनु झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई बन गई। रानी बनकर लक्ष्मीबाई को पर्दे में रहना पड़ता था। स्वच्छन्द विचारों वाली रानी को यह रास नहीं आया। उन्होंने क़िले के अन्दर ही एक व्यायाम शाला बनवाई और शस्त्रादि चलाने तथा घुड़सवारी हेतु आवश्यक प्रबन्ध किए। उन्होंने स्त्रियों की एक सेना भी तैयार की। राजा गंगाधर राव अपनी पत्नी की योग्यता से बहुत प्रसन्न थे। 1851 में रानी लक्ष्मीबाई ने एक पुत्र को जन्म दिया। सम्पूर्ण झाँसी आनन्दित हो उठा एवं उत्सव मनाया गया किन्तु यह आनन्द अल्प कालिक ही था। कुछ ही महीने बाद बालक गम्भीर रूप से बीमार हुआ और चार महीने की आयु में ही उसकी मृत्यु हो गयी। झाँसी शोक के सागर में डूब गई। सन् 1853 में राजा गंगाधर राव का स्वास्थ्य बहुत बिगड़ने पर दरबारियों ने उन्हें पुत्र गोद लेने की सलाह दी। अपने ही परिवार के पांच वर्ष के एक बालक को उन्हों ने गोद लिया और उसे अपना दत्तक पुत्र बनाया। इस बालक का नाम दामोदर राव रखा गया। पुत्र गोद लेने के बाद राजा गंगाधर राव की दूसरे ही दिन 21 नवंबर 1853 में मृत्यु हो गयी। दयालु स्वभाव रानी अत्यन्त दयालु भी थीं। एक दिन जब कुलदेवी महालक्ष्मी की पूजा करके लौट रही थीं, कुछ निर्धन लोगों ने उन्हें घेर लिया। उन्हें देखकर महारानी का हृदय द्रवित हो उठा। उन्होंने नगर में घोषणा करवा दी कि एक निश्चित दिन ग़रीबों में वस्त्रादि का वितरण कराया जाए।

❗झाँसी का युद्ध❗
उस समय भारत के बड़े भू-भाग पर अंग्रेज़ों का शासन था। वे झाँसी को अपने अधीन करना चाहते थे। उन्हें यह एक उपयुक्त अवसर लगा। उन्हें लगा रानी लक्ष्मीबाई स्त्री है और हमारा प्रतिरोध नहीं करेगी। उन्होंने रानी के दत्तक-पुत्र को राज्य का उत्तराधिकारी मानने से इंकार कर दिया और रानी को पत्र लिख भेजा कि चूँकि राजा का कोई पुत्र नहीं है, इसीलिए झाँसी पर अब अंग्रेज़ों का अधिकार होगा। रानी यह सुनकर क्रोध से भर उठीं एवं घोषणा की कि मैं अपनी झाँसी नहीं दूँगी। अंग्रेज़ तिलमिला उठे। परिणाम स्वरूप अंग्रेज़ों ने झाँसी पर आक्रमण कर दिया। रानी ने भी युद्ध की पूरी तैयारी की। क़िले की प्राचीर पर तोपें रखवायीं। रानी ने अपने महल के सोने एवं चाँदी के सामान तोप के गोले बनाने के लिए दे दिया। रानी के क़िले की प्राचीर पर जो तोपें थीं उनमें कड़क बिजली, भवानी शंकर, घनगर्जन एवं नालदार तोपें प्रमुख थीं। रानी के कुशल एवं विश्वसनीय तोपची थे गौस खाँ तथा ख़ुदा बक्श। रानी ने क़िले की मज़बूत क़िलाबन्दी की। रानी के कौशल को देखकर अंग्रेज़ सेनापति सर ह्यूरोज भी चकित रह गया। अंग्रेज़ों ने क़िले को घेर कर चारों ओर से आक्रमण किया। अंग्रेज़ आठ दिनों तक क़िले पर गोले बरसाते रहे परन्तु क़िला न जीत सके। रानी एवं उनकी प्रजा ने प्रतिज्ञा कर ली थी कि अन्तिम सांस तक क़िले की रक्षा करेंगे। अंग्रेज़ सेनापति ह्यूराज ने अनुभव किया कि सैन्य-बल से क़िला जीतना सम्भव नहीं है। अत: उसने कूटनीति का प्रयोग किया और झाँसी के ही एक विश्वासघाती सरदार दूल्हा सिंह को मिला लिया जिसने क़िले का दक्षिणी द्वार खोल दिया। फिरंगी सेना क़िले में घुस गई और लूटपाट तथा हिंसा का पैशाचिक दृश्य उपस्थित कर दिया। घोड़े पर सवार, दाहिने हाथ में नंगी तलवार लिए, पीठ पर पुत्र को बाँधे हुए रानी ने रणचण्डी का रूप धारण कर लिया और शत्रु दल संहार करने लगीं। झाँसी के वीर सैनिक भी शत्रुओं पर टूट पड़े। जय भवानी और हर-हर महादेव के उद्घोष से रणभूमि गूँज उठी। किन्तु झाँसी की सेना अंग्रेज़ों की तुलना में छोटी थी। रानी अंग्रेज़ों से घिर गयीं। कुछ विश्वासपात्रों की सलाह पर रानी कालपी की ओर बढ़ चलीं। दुर्भाग्य से एक गोली रानी के पैर में लगी और उनकी गति कुछ धीमी हुई। अंग्रेज़ सैनिक उनके समीप आ गए।

❗मृत्यु❗
रानी को असहनीय वेदना हो रही थी परन्तु मुख मण्डल दिव्य कान्त से चमक रहा था। उन्होंने एक बार अपने पुत्र को देखा और फिर वे तेजस्वी नेत्र सदा के लिए बन्द होगए। वह 17 जून,1858 का दिन था, जब क्रान्ति की यह ज्योति अमर हो गयी। उसी कुटिया में उनकी चिता लगायी गई जिसे उनके पुत्र दामोदर राव ने मुखाग्नि दी। रानी का पार्थिव शरीर पंच महाभूतों में विलीन हो गया और वे सदा के लिए अमर हो गयीं। इनकी मृत्यु ग्वालियर में हुई थी। विद्रोही सिपाहियों के सैनिक नेताओं में रानी सबसे श्रेष्ठ और बहादुर थी और उसकी मृत्यु से मध्य भारत में विद्रोह की रीढ़ टूट गई।

❗सिंहासन हिल उठे राजवंशों ने भृकुटी तानी थी।
❗बूढ़े भारत में आई फिर से नयी जवानी थी।
❗गुमी हुई आज़ादी की कीमत सबने पहचानी थी।
❗दूर फिरंगी को करने की सबने मन में ठानी थी।
❗चमक उठी सन सत्तावन में वह तलवार पुरानीथी।
❗बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी रानी थी।

❗सभी को रानी लक्ष्मी बाई कि जन्म जयंति कि हार्दिक शुभ कामना❗
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