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May 10, 2026

"स्वप्न सारथी: लायक सर की अनकही कहानी"

"स्वप्न सारथी: लायक सर की अनकही कहानी" 

"कहते हैं, प्रतिभा छिपती नहीं, चमकती है। ग्वालियर के मुरार की गलियों से निकला एक नाम, जो अपनी कक्षा का हमेशा सिरमौर रहा। इंटरमीडिएट के वो दिन... जहाँ स्कूल की टॉपर लिस्ट में सबसे ऊपर एक ही नाम गूँजता था— लायक सर जी ।"



"बचपन से ही मेधावी, खेल के मैदान में सबसे तेज, और सपनों में सबसे ऊँचे। लेकिन नियति ने जल्दी ही उनके कंधों पर जिम्मेदारी डाल दी। कम उम्र में शादी हुई, तो जीवन की प्राथमिकताएं बदल गईं। जहाँ लोग खुद के लिए जीना शुरू करते हैं, वहाँ उन्होंने दूसरों का भविष्य गढ़ने का फैसला किया।"



"मालनपुर की धरती गवाह बनी उनके नए संकल्प की। खुद के पदकों की जगह अब उन्होंने दूसरों के गले में स्वर्ण पदक देखने का सपना सजाया। कोचिंग सेंटर सिर्फ एक पढ़ाई का कमरा नहीं, बल्कि एक नर्सरी बन गया—जहाँ सिर्फ किताबी ज्ञान नहीं, बल्कि खेल-कूद और प्रतियोगिताओं के जरिए व्यक्तित्व निखारा जाता है।"



"पिछले 17 वर्षों से, लायक सर ने अपना हर पल विद्यार्थियों के नाम कर दिया। उनके लिए यह सिर्फ रोजी-रोटी का जरिया नहीं, बल्कि राष्ट्र सेवा का महायज्ञ है। 'सादा जीवन, उच्च विचार'—यह केवल उनके शब्द नहीं, उनकी पहचान है। आज भी, जब उनका कोई छात्र क्षेत्र में टॉप करता है, तो लायक सर की आँखों में वही पुरानी चमक लौट आती है, जो कभी मुरार के उस टॉपर छात्र की आँखों में थी।"



"वक्त बदला, हालात बदले, पर नहीं बदला तो उनका जुनून। आज भी वे उसी शिद्दत से जुटे हैं, क्योंकि वे जानते हैं कि एक शिक्षक कभी रिटायर नहीं होता... वह तो पीढ़ियों के सपनों का सारथी होता है। नमन है ऐसे व्यक्तित्व को!"



August 10, 2025

बोधकथा - अक्रोधी और सत्यवादी युधिष्ठर akrodhee aur satyavaadee yudhishthar

प्राचीन समय में इस आर्यावर्त देश में यमुना नदी के तट पर हस्तिनापुर नाम की एक सुन्दर नगरी बसी हुई थी। एक समय राजा धृतराष्ट्र यहाँ पर राज्य करते। इनके एक सौ एक पुत्र थे, जो कौरव कहलाते थे। इनमें सबसे बड़े दुर्योधन थे। इसी प्रकार राजा धृतराष्ट्र के भाई पांडू के भी पांच पुत्र थे, जो पाण्डव कहलाते थे। इनमें सबसे बड़े युधिष्ठर थे। ये सब राजकुमार गुरु द्रोणाचार्य से पढ़ते थे।


एक बार गुरु द्रोणाचार्य ने उन सबको यह पाठ पढ़ाया की क्रोध कभी  नहीं करना चाहिए, और सदा सच बोलना चाहिए। गुरु ने आज्ञा दी कि इस पाठ को खूब याद कर कल सुनाएँ। अगले दिन गुरूजी ने सब राजकुमारों को पिछला पाठ सुनाने को कहा। बाकि सबने तो अपना पाठ सुना दिया, लेकिन युधिष्ठर ने कहा- गुरुदेव । मुझे अभी पाठ याद नहीं हुआ। गुरुजी ने कहा-अच्छा कल सुना देना।

अगले दिन फिर गुरूजी ने युधिष्ठर से पाठ पूंछा पर उसने फिर भी यही कहा- मुझे अभी पाठ याद नहीं हुआ। एक-एक करके सात दिन बीत गए। युधिष्ठर मन लगाकर पाठ याद करते रहे। अब आठवें दिन जब गुरूजी ने युधिष्ठर से पाठ सुनाने को कहा तो उन्होंने फिर वही शब्द कहे। अब तो गुरूजी के क्रोध की सीमा न रही और लगे उसे पीटने । पर युधिष्ठर ने उस दण्ड को प्रसन्न्तापूर्वक सहन किया। अन्त में जब गुरूजी का क्रोध शांत हुआ, युधिष्ठर हाथ जोड़कर कहने लगे - गुरुदेव अब मुझे पाठ का पहला भाग क्रोध कभी नहीं करना चाहिए याद हो गया है। क्योंकि आपने मुझे बहुत पीटा, पर मुझे क्रोध नहीं आया, परन्तु इसका पिछला भाग सदा सच बोलना चाहिए का अभी अभ्यास कर रहा है। जब इसे अपने जीवन में उतर लेगा, तब यह पाठ भी सुना दूँगा। सुनकर द्रोणाचार्य बड़े प्रसन्न हुए। उन्होंने मन में विचार किया जिसके इतने उत्तम विचार हैं, वह एक दिन अवश्य महान पुरुष बनेगा।

जीवन-भर युधिष्ठर ने इन दोनों व्रतों को निभाया। कभी क्रोध नहीं किया और सच ही बोलते रहे। इन्ही बातो से उन्हें धर्मराज युधिष्ठर कहते हैं।


बोधकथा - मन की एकाग्रता concentration of mind

एक दिन स्वामी विवेकानंद नदी के किनारे टहल रहे थे। उन्होंने देखा कि कुछ नवयुवक पुल पर खड़े होकर पानी की लहरों में तैर रहे गेंदों पर निशाना लगा रहे हैं।

सभी गेंदे एक धागे में बंधे हुए थे। दूसरे किनारे पर एक पत्थर बंधा हुआ था जिसके परिणाम स्वरुप वे पानी के बहाव में बह नहीं सकते थे। बड़ी देर से स्वामी जी उन नवयुवकों के असफल प्रयास को देखकर खड़े - खड़े मुस्करा रहे थे।

लहरों के कारण वे गेंदे लगातार इधर इधर हिल डुल रहे थे। अतः निशाना ठीक लगता नहीं था। वास्तव में काम बहुत ही कठिन था। एक युवक ने स्वामी जी को मुस्कराते हुए देख लिया। वह व्यंगात्मक आवाज में बोला, "आप हम पर हँस रहे हैं। मगर निशाना लगाना सरल काम नहीं है। आप में क्षमता हो तो आप ही निशाना लगाकर दिखा दीजिए।"

स्वामी विवेकानंद ने उसी स्वाभाविक ढंग से मुस्कुराते हुए कहा, "लाओ भाई, जरा मैं भी प्रयास करके देखता हूँ।"



उस नवयुवक ने आश्चर्य से देखा कि स्वामी जी ने एक-दो नहीं लगभग सभी गेंदों पर निरंतर सफल निशाने लगाकर दिखाये। अब तो युवक उनकी प्रतिभा पर चकित रह गये। सभी एक स्वर में बोले "लगता है कि आप एक सफल निशानेबाज है। स्वामी विवेकानंद के मुखमंडल पर पुनः मुस्कान थिरक उठी। वे बोले "नहीं भाई, मैंने बन्दूक अपने जीवन में पहली बार उठायी है।" फिर यह बतलाया कि, "लक्ष्य साधने की सफलता अभ्यास से अधिक मन की एकाग्रता पर निर्भर करती है।

Concentration Of Mind

One day Swami Vivekananda was strolling on the bank of a river. He saw some young men standing on a bridge aiming at the balls floating in the waves of water.

All the balls were tied to a thread. A stone was tied on the other end due to which they could not be swept away by the flow of water. For a long time Swamiji was standing and smiling seeing the unsuccessful attempts of those young men.

Due to the waves those balls were constantly moving here and there. Hence the aim was not accurate. In reality the task was very difficult. One young man saw Swamiji smiling. He said in a sarcastic voice, "You are laughing at us. But aiming is not an easy task. If you have the ability then you yourself aim and show it."

Swami Vivekananda said smiling in the same natural manner, "Let me also try brother."

That young man saw with surprise that Swamiji showed successful aiming not on one or two but on almost all the balls continuously. Now the youth were astonished at his talent. All of them said in one voice, "It seems that you are a successful marksman." A smile again danced on Swami Vivekananda's face. He said, "No brother, I have picked up a gun for the first time in my life." Then he said, "The success of hitting the target depends more on concentration of mind than practice."

August 04, 2025

पूजनीय कौन

एक मंदिर में स्थापित पत्थर प्रतिमा पर चढ़ाए गए पुष्प ने क्रोधित होकर पुजारी से कहा, तुम प्रतिदिन इस पत्थर प्रतिमा पर मुझे चढ़ाकर इसकी पूजा करते हो। वह मुझे कतई पसंद नहीं है। पूजा मेरी होनी चाहिए क्योंकि मैं कोमल, सुन्दर, सुवासित हूँ। वह तो मात्र पत्थर की मूर्ती है।

मंदिर के पुजारी ने हँसते हुए कहा, हे पुष्प, तुम कोमल, सुन्दर, सुगन्धित अवश्य हो पर तुम्हें ईश्वर ने ऐसा बनाया है। ये गुण तुम्हें सहजता से प्राप्त हुए हैं। इनके लिए तुम्हें कोई श्रम नहीं करना पड़ा है। पर देवत्व प्राप्त करना बड़ा कठिन काम है। इस देव प्रतिमा का निर्माण बड़ी कठिनाई से किया जाता है। एक कठोर पत्थर को देव प्रतिमा बनने के लिये हजारों चोटें सहनी पड़तीं हैं। चोट लगते ही अगर यह टूट के बिखर जाता तो शायद यह कभी देव प्रतिमा नहीं बन सकता था। एक बार अगर कठोर पत्थर देव प्रतिमा में ढल जाए तो लोग उसे बड़े आदर भाव से मंदिर में स्थापित कर प्रतिदिन उसकी पूजा अर्चना करते हैं। इस पत्थर की सहनशीलता ने ही इसे देव प्रतिमा के रूप में पूजनीय तथा वन्दनीय बना दिया है।

यह सुनकर पुष्प मुस्कुरा दिया। वह समझ गया की कठिन परीक्षा को सफलतापूर्वक पार करने वाला ही देवत्व प्राप्त करता है।

बोध कथा - समर्पण


संत कबीर ने एक आदर्शवादी जीवन जिया। उनकी बेटी की शादी थी। पास में पैसा नहीं था। बेटी की शादी के दिन निकट आ गए थे। उन्होंने सोचा कि थोडा कपडा बुना है। उसी को बेचकर कुछ पैसे की व्यवस्था की जाए ताकि कुछ तो व्यवस्था हो। वे कपड़ा कंधे पर रखकर दोपहरी में बेचने निकले। धुप तेज थी, रास्ते में एक बृक्ष देखकर उसके नीचे छाँव लेने बैठ गए। इतने में सामने से एक पथिक आया और वह भी पेड़ के नीचे बैठकर छाँव लेने लगा। कबीर ने पुछा कहो भाई। तुम इतनी धूप में कहाँ जा रहे हो? पथिक ने कहा- मैं तो कबीर के पास जा रहा हूँ। कबीर ने पथिक से पूँछा- उनसे क्या काम है? पथिक ने कहा- देख नहीं रहे हो, मेरी धोती फट गयी है। इतनी फट गयी हैं कि इससे लाज बचाना मुश्किल हो गया है। कबीर ने साथ में लिए कपडे में से उसको धोती के लिए कपड़ा फाड़कर दे दिया। कपड़ा पाकर वह बहुत खुश हुआ और कहा- अच्छा हुआ धोती तुमने दे दी, अब गमछा कबीर से मांग लूँगा ताकि स्नान के बाद धोती बदलने में सुविधा हो। कबीर ने कपड़े में से गमछा भी फाड़कर दे दिया। पथिक ने कहा - धोती गमछा तुमने दे दिया, अब कमीज का कपड़ा कबीर से मांग लूँगा। इतना सुनते ही कबीर ने बचा हुआ कपड़ा पथिक को दे दिया और कहा कि इसकी कमीज बनवा लेना। कबीर खाली हाथ घर लौट आए। कबीर के मन में बेटी की शादी से भी अधिक चिंता दीन-दुखियों के लिए थी। आदर्शवादी और ध्येयवादी की मूल प्रवृति परोपकारी होती है।


June 30, 2025

बोधकथा- रूप व गुण- श्रेष्ठ कौन ? moral Story - Beauty and virtue - which is the best?

 रूप व गुण- श्रेष्ठ कौन ?

            मगध सम्राट चन्द्रगुप्त ने एक बार आचार्य चाणक्य से कहा, 'गुरुवर, काश! आप सुन्दर होते? चाणक्य ने कहा, "राजन! मनुष्य की पहचान उसके गुणों से होती हैं, रंगरुप से नहीं।' तब चन्द्रगुप्त ने पूछा, "आचार्य, क्या आप ऐसा कोई उदाहरण प्रस्तुत कर सकते हो जहाँ 'गुण' के सामने 'रूप' छोटा रह गया हो। तब चाणक्य ने राजा को दो अलग-अलग गिलास पानी पीने को दिया। फिर चाणक्य ने कहा, 'पहले गिलास का पानी स्वर्ण के घड़े का था और दूसरे गिलास का पानी मिट्टी के घड़े का। आपको कौन-सा पानी अच्छा लगा।' चन्द्रगुप्त बोले, 'मिट्टी के घड़े का'। पास ही सम्राट की पत्नी बैठी थी। वह इस उदाहरण से काफी प्रभावित हुई। महारानी ने कहा, ।''वो सोने का घड़ा किस काम का जो संतुष्टि न दे सके। मटकी भले ही कुरुप हो, लेकिन प्यास मटके के पानी से ही बुझती है यानि रूप नहीं गुण महत्वपूर्ण होता है।

Beauty and virtue - which is the best?
                Once Magadh emperor Chandragupta said to Acharya Chanakya, 'Guruvar, I wish you were beautiful. Chanakya said, "O King! A man is identified by his virtues, not by his looks." Then Chandragupta asked, "Acharya, can you give an example where 'beauty' has fallen short in front of 'virtues'. Then Chanakya gave the king two separate glasses of water to drink. Then Chanakya said, 'The water in the first glass was from a golden pot and the water in the second glass was from an earthen pot. Which water did you like?' Chandragupta said, 'The water from the earthen pot.' The emperor's wife was sitting nearby. She was very impressed by this example. The queen said, 'What is the use of a golden pot that cannot give satisfaction. The pot may be ugly, but thirst is quenched only by the water from the pot.' That is, it is the qualities that are important, not the beauty.