May 29, 2024

कक्षा 10 हिंदी कहानी ओर उपन्यास की परिभाषा एवं अन्तर

 कहानी - एक कहानी या कथा शब्दों (लिखित या मौखिक), कल्पना (स्थिर और गतिशील), शारीरिक भाषा, प्रदर्शन, संगीत, या संचार के किसी अन्य रूप के माध्यम से बताई गई घटनाओं की एक जुड़ी हुई श्रृंखला है। 

कहानी किसी व्यक्ति जीवन की किसी एक घटना पर आधारित होती है 

May 22, 2024

कक्षा 10 हिंदी व्याकरण (अलंकर )

अलंकार 

अलंकार का शाब्दिक अर्थ हैै ‘‘आभूषण‘‘।  काव्य की शोभा में वृद्धि करने वाले  कारकों को अलंकार कहते है। जिस प्रकार आभूषण धारण करने से स्त्री के सुन्दरता में वृद्धि होती है उसी प्रकार अलंकार काव्य में सुन्दरता, चमत्कार तथा रोचकता उत्पन्न करतें है।
अलंकार तीन प्रकार के होते हैं।
1. शब्दाअलंकार - जिस रचना में शब्दों के कारण चमत्कार होता है  वंहा शब्दालंकार होता है 
जैसे - अनुप्रास अलंकार, श्लेष अलंकार, यमक अलंकार आदि  
2. अर्थ अलंकार - जिस रचना में अर्थ  के कारण चमत्कार होता है  वंहा अर्थालंकार होता है 
जैसे - उपमा अलंकार, उत्प्रेक्षा अलंकार, और रूपक अलंकार आदि
3. उभयालंकार -  जिस रचना में शब्द और अर्थ  दोनों  के कारण चमत्कार होता है  वंहा उभयालंकार  होता है  
 
अनुप्राश अलंकार - व्यंजन वर्णों की आवृति (जब एक वर्ण या अक्षर दो या दो से अधिक बार आया हो) 
उदाहरण - 
1. रघुपति राघव राजाराम। 
    पतित पावन सीताराम।। 
    ( र वर्ण की आवृति  3 बार  हुई है)
2. चंचल सा वदन चंचल चितवन। 
    (च वर्ण की आवृति बार-2 हुई है)

यमक अलंकार - जहाॅं एक शब्द एक से अधिक बार प्रयुक्त हो और उसके अर्थ हर बार अलग अलग हों 
उदाहरण -
1. कनक कनक तें सौ गुनी मादकता अधिकाय। 
    वा खाय बौराय जग, या पाय बौराय।
    ( पहले कनक का अर्थ है धतुरा  और दुसरे कनक का अर्थ गई सोना )
2. सजना है मुझे, सजना के लिये।
    (पहले सजना का मतलब है मेकप करना और दूसरे सजना का मतलब है पति)
3. काली घटा का घमंड घटा। 
    (पहली घटा का मतलब है घने बादल और दूसरी घटा का मतलब है घमंड कम होना )
4. तीन बेर खाती थी, वे तीन बेर खती है।
    (पहले तीन बेर का मतलब है तीन बार खाना और दूसरे तीन बेर का मतलब है कि तीन बेर
5. ये सूट तुझपे सूट करता। 

श्लेष अलंकार - एक शब्द में एक से अधिक अर्थ  जुडे/चिपके हों अर्थात् कोई शब्द एक ही बार प्रयुक्त हो किंतु प्रसंग भेद में उसके अर्थ अलग अलग हों।)
उदाहरण- 
रहिमन पानी राखिये, बिन पानी सब सून।
 पानी गये न उबरै, मोती मानुष चून ।।           
 (मोती-चमक,मानुष-प्रतिष्ठा,चून-जल)

अतिश्योक्ति अलंकार - जहाॅं किसी बात का या लोक -मर्यादा का उल्लघंन करके अर्थात बहुत बढ़ा चढ़ा कर वर्णन किया जाता है वहां अतिश्योक्ति अलंकार होता है 
उदाहरण - 
1. पानी परात को हाथ छुओ नही,
    नयनन के जल सों पग धोए।
2. हनुमान की पूॅछ में, लगन न पायी आग।
    लंका सारी जरि गयी, गये निशाचर भाग।

अन्योक्ति अलंकार - जहाँ किसी उक्ति के माध्यम से किसी अन्य को कोई बात कही जाए, वहाँ अन्योक्ति अलंकार होता है। कथन कहीं,निशाना कहीं। अतः यहाँ अन्योक्ति अलंकार है। 
जैसे -
1.  नहिं पराग नहिं मधुर मधु, नहिं विकास इहि काल। 
    अली कली ही सौं बंध्यो, आगे कौन हवाल
स्पष्टीकरण - यंहा कवि ने भौरे को निशाना साधकर महाराज जय सिंह को उनकी वास्तविक स्थिति का आभास कराया है 
2. माली आवत देखि के, कलियाँ करैं पुकार।
     फूली-फूली चुनि गई, कालि हमारी बार॥
 मृत्यु रूपी माली को आता देखकर अल्पवय जीव कहता है कि जो पुष्पित थे अर्थात् पूर्ण विकसित हो चुके थे, उन्हें काल चुन ले गया।
 
मानवीकरण अलंकार -  जहाँ पर स्थिर और निर्जीव चीजों का मनुष्य के जैसा बर्ताव और क्रियाएं करने का वर्णन हो वहां पर मानवीकरण अलंकार होता है।
या   
जब जड़ पदार्थों और प्रकृति के अंग ( जैसे- नदी, पर्वत, फूल, बादल पेड़, लताएँ, झरने, हवा, पत्थर, पक्षी, इत्यादि) मनुष्य जैसा क्रिया या व्यवहार करता हुआ दिखाया जाता है तब उसे मानवीकरण अलंकार कहा जाता है। 

उदाहरण -
1. जगीं वनस्पतियाँ अलसाई मुख धोतीं शीतल जल से।
(यहाँ पर प्रकृति को एसे वर्णन किया है जैसे मानव के रुपों में वर्णन किया है।
2. फूल हँसे कलियाँ मुसकाई। मेघ आये बड़े बन-ठन के संवर के।

पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार - जहाँ काव्य में एक ही शब्द की बार-बार आवृत्ति हो किंतु अर्थ की भिन्नता नही होती है, वहाँ पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार होता है।
उदाहरण -  
मेघमय आसमान से उत्तर रही है 
              वह संध्या सुंदरी परी सी
                   धीरे-धीरे-धीरे

स्पष्टीकरण-  यहाँ पर धीरे शब्द की आवृत्ति हुई है।




May 20, 2024

कक्षा 10 हिंदी व्याकरण ( रस)

 रस किसे कहते है?

‘रस‘ का शाब्दिक अर्थ है ‘आनंद‘।

किसी काव्य को पढने, सुनने या देखने पाठक या दर्शक को जिस आनंद की अनुभूति होती है, उसे ‘रस‘ कहा जाता है। 

प्रश्न - रस के कितने अंग होते हैं उनके नाम लिखिए 

रस के चार अवयव (अंग) होते है -

1. स्थायी भाव    

2. विभाव 

3. अनुभाव 

4. संचारी भाव/व्यभिचारी भाव 

प्रश्न - स्थायी भाव किसे कहते हैं और यह कहां विद्यमान हैं?

1. स्थायी भाव - स्थायी भाव का मतलब है प्रधान भाव (मुख्य भाव), जो काव्य या नाटक में एक स्थायी भाव शुरू से  लेकर आखिर तक होता है स्थायी भावों की संख्या नौ मानी गयी है। 

2. विभाव - स्थायी भावों के उद्बोधक (जगाने वाले) कारण को विभाव कहते हैं। 

विभाव दो प्रकार के होते हैं 

1) आलंबन विभाव  2) उद्दीपन विभाव

1) आलंबन विभाव- जिसका आलंबन या सहारा पाकर स्थायी भाव जगते हैं आलंबन विभाव कहलाता है 

जैसे- नायक नायिका आलंबन विभाव के दो पक्ष होते हैं  

उदाहरण- यदि राम के मन में सीता के प्रति रति का भाव जगता है तो राम आश्रय होंगे और सीता विषय होगी 

2) उद्दीपन विभाव- जिन वस्तुओं व परिस्थतियों को देखकर स्थायी भाव उद्दीप्त होने लगता है उद्दीपन विभाव कहलाता है। 

जैसे - चाॅदनी, कोकिल, एकांत स्थल, नायक और नायक की शारीरिक चेष्टाए आदि।

3. अनुभाव - मन में आए हुए भाव को व्यक्त करने वाले शरीर विकार अनुभाव कहलाते हैं अनुभावों की संख्या आठ मानी गयी है। 

1.स्तम्भ          2. स्वेद 3.रोमांच

        4. स्वर भंग 5. कंप

6. विवर्णता (रंगहीनता)    7. अश्रु

        8. प्रलय (संज्ञाहीनता/निश्चेष्टता)

4. संचारी  भाव/व्यभिचारी भाव - मन में संचरण करने वाले (आने जाने वाले) भावों को संचारी भाव कहते हैं संचारी भावों की कुल संख्या 33 मानी गयी है कुछ इस प्रकार हैं हर्ष, विषाद, त्रास (भय) आदि।

 प्र. श्रृंगाार रस किसे कहते है? उदाहरण सहित समझाइऐ 

विभाव, अनुभाव, संचारी भाव के योग से रति (प्रेम) नामक स्थायी भाव द्वारा श्रृंगार रस की उत्पत्ति होती है।

श्रृंगाार रस दो प्रकार का होता है-

संयोग श्रृंगार - संयोग श्रृंगाार में नायक और नायिका का मिलन होता है।

 उदहारण - 

1. राम को रूप निहारति जानकी, कंगन के नग की परछाही।

   यातै सबै सुधि भूलि गयी, कर टेक रही पल टारत नाहीं।

 2. मेरे तो गिरिधर गोपाल दूसरो न कोई 

     जाके सिर मोर मुकुट मेरो पति सोई।

वियोग श्रृंगार  - वियोग श्रंगार में नायक और नायिका बिछडते हैं। 

उदहारण -        

हे खग मृग हे मधुकर श्रेणी, तुम देखी सीता मृग  नयनी। 

प्र. हास्य रस किसे कहते है? उदाहरण सहित समझाइऐ

विभाव, अनुभाव, संचारी भाव के योग से हास नामक स्थायी भाव द्वारा हास्य रस की उत्पत्ति होती है।

उदहारण -

1. बंदर ने कहा बंदरिया  से  चलो नहाने गंगा 

    बच्चों को छोडो घर पर होने दो हुडदंगा।

 2. सीरा पर गंगा हसै, भुजानि में भुजंगा हसै 

     हास ही को दंगा भयो ,नंगा के विवाह में।

प्र. करूण रस किसे कहते है? उदाहरण सहित समझाइऐ

विभाव, अनुभाव, संचारी भाव के योग से शोक नामक स्थायी भाव द्वारा करूण रस की उत्पत्ति होती है।

उदहारण -

1. हे प्रिय पति प्राँण प्यारा कहाँ है, 

  दुःख जल निधि डूबी का सहारा कहाँ है।

  लख मुख जिसका में आज लो जी सकी हूँ 

  वह हृदय हमारा नयन तारा कहाँ है।

प्र. वीर रस किसे कहते है? उदाहरण सहित समझाइऐ

विभाव, अनुभाव, संचारी भाव के योग से उत्साह नामक स्थायी भाव द्वारा वीर रस की उत्पत्ति होती है।

उदहारण -

1. बुंदेले हर बोलों  मुह, हमने सुनी कहानी थी

   खूब लडी मर्दानी वो तो झाॅसी वाली रानी थी।

 2. दूध मागोगे तो खीर देंगे, कश्मीर मागोगे तो चीर देंगे।

प्र. रोंद्र रस किसे कहते है? उदाहरण सहित समझाइऐ

विभाव, अनुभाव, संचारी भाव के योग से क्रोध नामक स्थायी भाव द्वारा रोंद्र रस की उत्पत्ति होती है।

उदहारण -

1. श्री कृष्ण के सुनकर वचन, अर्जुन क्रोध के जलने लगे 

    सब शील अपना भूलकर, करतल युगल मलने लगेे।

2. उस काल मरे क्रोध के तन कापने उसका लगा 

    मानो हवा के जोर से सोता हुआ सागर जगा।

प्र. भयानक रस किसे कहते है? उदाहरण सहित समझाइऐ

विभाव, अनुभाव, संचारी भाव के योग से भय नामक स्थायी भाव द्वारा भयानक रस की उत्पत्ति होती है।

उदहारण -

1. एक ओर अजगरहि लखि, एक ओर मृगराय

    विकल बटोही बीच ही परयों मूर्छा खाय। 

2. देखे जब बारात में भूत प्रेत सब व्याल 

   थर थर काँपे नारी नर भाग चले सब व्याल ।

प्र.  वीभत्य रस किसे कहते है? उदाहरण सहित समझाइऐ 

विभाव, अनुभाव, संचारी भाव के योग से जुगुप्त्सा/घृणा नामक स्थायी भाव द्वारा वीभत्य रस की उत्पत्ति होती है।

उदहारण -

1. घर में लाशें बाहर लाशें सडती लाशें नुस्ती लाशें

     दुर्गंध छाडती हैं साँसे इंसान हुआ लाशें-लाशें।   

प्र.  अद्भुत रस किसे कहते है? उदाहरण सहित समझाइऐ

विभाव, अनुभाव, संचारी भाव के योग से विस्मय/आश्चर्य नामक स्थायी भाव द्वारा अद्भुत रस की उत्पत्ति होती है।

उदहारण -

1.नारी बीच सारी है कि सारी बीच नारी है

   नारी ही की सारी है कि नारी की ही सारी है।

2. देख यशोदा शिशु के मुख में, सकल विश्व की माया

    क्षण भर को वह बनी अचेतन, हिल न सकी कोमल काया।

3. अखिल भुवन चर अचर सव हरि मुख में लखि मातु

    यकित भई गद-गद वचन विकसिन द्रग पुलकात

प्र. शांत रस किसे कहते है? उदाहरण सहित समझाइऐ

विभाव, अनुभाव, संचारी भाव के योग से निर्वेद/शम नामक स्थायी भाव द्वारा शांत रस की उत्पत्ति होती है।

उदहारण - 

1. चलती चाकी देखकर दिया कबीरा रोई

दुई पाटन के बीच में साबुत बचा न कोई।

2. मन रे तन कागद का पुतला,

   लागै बूॅद विनसि जाए छिन में गरब करे क्या इतना।

टीप -  

1. श्रंगार रस को रासराज या रसपति कहा जाता है।

2. नाटक में आठ ही रस माने जाते हैं क्योंकि वहां शांत का रस में नहीं गिना जाता।(भरत मुनि ने रसों                     की संख्या आठ मानी है)

3. श्रंगार रस के व्यापक दायरे में वत्सल रस और भक्ति रस आ जाते हैं इस लिये रसों की संख्या नौ ही                     मानना ज्यादा उचित है।



Class 12th Phy Ch - 9A. प्रकाश का परावर्तन (Reflection of Light)

प्र. प्रकाशिकी से आप क्या समझते है? कितने प्रकार की होती है?

प्रकाशिकी - प्रकाशिकी भौतिकी की वह शाखा है जिसके अन्तर्गत प्रकाश ऊर्जा और उस से सम्बन्धित परिघटनाओं जैसे - प्रकाश का परावर्तन, अपवर्तन, व्यतिकरण, विवर्तन, ध्रुवण आादि का अध्ययन किया जाता है। 

प्रकाशिकी की दो शाखाऐ है-

१. किरण प्रकाशिकी

२.  तंरग प्रकाशिकी

1.  किरण प्रकाशिकी- किरण प्रकाशिकी के अन्तर्गत प्रकाश से संबन्घित परिघटनाओं का अध्ययन इस आधार पर किया जाता है कि प्रकाश, किरणों से मिलकर बना है।

2. तंरग प्रकाशिकी - तंरग प्रकाशिकी के अन्तर्गत प्रकाश से संबन्धित परिघटनाओं का   अध्ययन इस आधार पर किया जाता है कि प्रकाश तंरग के रूप में एक स्थान से दुसरे स्थान तक गमन करता है।

प्र. प्रकाश का परावर्तन क्या है?  इसके नियम लिखिऐ।

उ. प्रकाश का किसी सतह से टकराकर उसी माघ्यम में वापस आ जाना प्रकाश का परावर्तन कहलाता है। 

परावर्तक पृष्ठ -   प्रकाश का जिस पृष्ठ से परावर्तन होता है उस पृष्ठ को परावर्तक पृष्ठ कहते है। दैनिक जीवन में परावर्तक पृष्ठ के रुप में समतल दर्पण का उपयोग किया जाता है। 


आपतित किरण- परावर्तक पृष्ठ पर आने (टकराने) वाली किरण AB को को आपतित किरण कहते है।
परावर्तित किरण - परावर्तक पृष्ठ से जाने वाली किरण   BC  को परावर्तित किरण कहते है। 
आपतन बिन्दु - परावर्तक पृष्ठ के जिस बिन्दु पद पर प्रकाश किरण आपतित होती है उस बिन्दु को आपतन बिन्दु कहते है। यहॉ   B  आपतन बिन्दु है।
अभिलम्ब - परावर्तक पृष्ठ के आपतन बिन्दु B पर लम्बवत् खीची गई रेखा को अभिलम्ब (BN)कहते है। 
आपतन कोण - आपतित किरण और अभिलम्ब के बीच के कोण को  आपतन कोण कहते है। इसे अक्षर i से प्रदर्शित करते है।
परावर्तन के नियम - परावर्तन के निम्न दो नियम है-
1. आपतन कोण सदैव परावर्तन कोण के बराबर होता है।
2. आपतित किरण, परावर्तित किरण और आपतन बिन्दु पर अभिलम्ब तीनो एक ही तल मे होते है।

प्र. दर्पण क्या है? यह कितने प्रकार का होता है?
दर्पण - दर्पण वह युक्ति है जो अपने पर आपतित संर्म्पूण प्रकाश किरणों को परावर्तित कर देता है। व्यवहार में कॉच पर टिन व मरकरी के यौगिकों की कलई करके दर्पण बनाया जाता है।
दर्पण तीन प्रकार के होते है- 
1. समतल दर्पण - ऐसा दर्पण जिसका परावर्तक पृष्ठ समतल होता है वह समतल दर्पण कहलाता है।
2. गोलीय दर्पण - ऐसा दर्पण जिसका परावर्तक पृष्ठ गोलीय (उभरा हुआ या दबा हुआ ) होता है वह गोलीय दर्पण कहलाता है। 
गोलीय दर्पण दो प्रकार के होते है-

अवतल दर्पण - ऐसा दर्पण जिसका परावर्तक पृष्ठ दबा हुआ होता है वह अवतल दर्पण कहलाता है।
उत्तल दर्पण - ऐसा दर्पण जिसका परावर्तक पृष्ठ उभरा (उठा ) हुआ होता है वह उत्तल दर्पण कहलाता है।  

3. परवलयाकार दर्पण-  ऐसा दर्पण जिसका परावर्तक पृष्ठ परवलयाकार हुआ होता है वह परवलयाकार दर्पण कहलाता है।  

प्र. गोलीय दर्पण से सम्बन्धित निम्न को परिभााषित कीजिए।
द्वारक - गोलीय दर्पण के दोनो सिरों को मिलाने वाली सबसे बडी रेखा कर लम्बाई को दर्पण का द्वारक कहते है। XY दर्पण में द्वारक है।
ध्रुव - गोलीय दर्पण के परावर्तक पृष्ठ के मध्य बिन्दु को उस दर्पण का ध्रुव कहलाता है। चित्र में P दर्पण का ध्रुव है।
वक्रता केन्द्र- गोलीय दर्पण जिस खोखले गोले का भाग है उस गोले के केन्द्र को गोलीय दर्पण का वक्रता केन्द्र कहलाता है। चित्र में C गोलीय दर्पण का वक्रता केन्द्र है।
वक्रता त्रिज्या - गोलीय दर्पण जिस खोखले गोले का भाग है उस गोले के केन्द्र को गोलीय दर्पण की वक्रता त्रिज्या कहते है।  इसे R से प्रदर्शित करते है। चित्र में PC वक्रता त्रिज्या है। 

मुख्य अक्ष- गोलीय दर्पण के ध्रुव P और वक्रता केन्द्र C को मिलाने वाली रेखा को उस दर्पण का मुख्य अक्ष कहलाता है। चित्र में PC गोलीय दर्पण का मुख्य अक्ष है। 

मुख्य फोकस -
गोलीय दर्पण के मुख्य अक्ष के समान्तर आपतित होने वाली किरणें दर्पण से परावर्तन के बाद मुख्य अक्ष के जिस बिन्दु पर मिलती है (अवतल दर्पण) या जिस बिन्दु से आती हुई प्रतीत होती है उस बिन्दु को दर्पण का मुख्य अक्ष कहते है। चित्र में F दर्पण का मुख्य फोकस है।

फोकस दूरी- किसी दर्पण के ध्रुव  P और मुख्य फोकस F के बीच की दूरी को उस दर्पण की फोकस दूरी कहते है। इसे f से प्रदर्शित करते है। चित्र में PF दर्पण की फोकस दूरी है।
फोकस समतल -  दर्पण के मुख्य अक्ष के लम्बवत् और फोकस से गुजरने वाले काल्पनिक  तल को दर्पण का फोकस कहते है। 
प्र. गोलीय दर्पणो द्वारा प्रतिम्बिबों निर्माण किस प्रकार होता है? समझाइए। 
गोलीय दर्पणों में प्रकाश के परावर्तन के कारण किसी वस्तु का प्रतिम्बिंब बनता है। गोलीय दर्पणों के लिए परावर्तन के वही नियम लागू होते है जो समतल दर्पणों के लिए है। किसी भी बिन्दु वस्तु से होकर असंख्य किरणें आती है किन्तु उसके प्रतिम्बिंब की स्थिति ज्ञात करने के लिए किन्ही भी दो किरणों को लेना पर्याप्त होता है। 

अवतल दर्पण द्वारा प्रतिबिंम्ब का बनना- अवतल दर्पण के सामने विभिन्न स्थितियों में रखी वस्तु के प्रतिबिंम्ब की स्थिति, आकार और प्रकृति निम्नवत् है-
स्थिति 1. जब वस्तु अनंन्त पर हो।

प्रतिबिंम्बि की स्थिति- मुख्य फोकस पर
प्रतिबिंम्ब का आकार - बिन्दु के आकार का
प्रतिबिम्बि की प्रकृति-  वास्तविक एवं उल्टा  
स्थिति 2. जब वस्तु अनंन्त और वक्रता केन्द्र के बीच स्थित हो।

प्रतिबिंम्बि की स्थिति-  वक्रताकेन्द्र और मुख्यफोकस के बीच

प्रतिबिंम्ब का आकार - वस्तु से छोटा

प्रतिबिम्बि की प्रकृति-  वास्तविक एवं उल्टा  

स्थिति 3. जब वस्तु वक्रता केन्द्र पर स्थित हो।

प्रतिबिंम्बि की स्थिति-  वक्रता केन्द्र पर

प्रतिबिंम्ब का आकार - वस्तु के बराबर

प्रतिबिम्बि की प्रकृति-  वास्तविक एवं उल्टा  

स्थिति 4. जब वस्तु वक्रता केन्द्र और मुख्य फोकस के बीच स्थित हो।

प्रतिबिंम्बि की स्थिति-  वक्रता केन्द्र और अनन्त के बीच

प्रतिबिंम्ब का आकार - वस्तु के बडा

प्रतिबिम्बि की प्रकृति-  वास्तविक एवं उल्टा  

 स्थिति 5. जब वस्तु फोकस पर स्थित हो।

प्रतिबिंम्बि की स्थिति-  अनन्त पर

प्रतिबिंम्ब का आकार - वस्तु के बहुत बडा

प्रतिबिम्बि की प्रकृति-  वास्तविक एवं उल्टा  

स्थिति 6. जब वस्तु फोकस और धु्रव के बीच स्थित हो।

प्रतिबिंम्बि की स्थिति-  दर्पण के पीछे 

प्रतिबिंम्ब का आकार - वस्तु के बडा

प्रतिबिम्बि की प्रकृति-  आभासी एवं सीधा

उत्तल दर्पण द्वारा प्रतिबिंम्ब का बनना -  उत्तल दर्पण के सामने स्थित वस्तु का प्रतिम्बिंब दर्पण के दूसरी ओर (दर्पण के पीछे) दर्पण के ध्रुव और फोकस के बीच बनता है जो वस्तु से छोटा, आभासी और सीधा होता है।


प्र. दूरी मापने के लिए उपयोग की जाने वाली चिन्ह परिपाटी को समझाइऐ ।

दर्पण मे दूरियॉं मापने के लिए नई कार्तीय चिन्ह परिपाटी का उपयोग करते है। यह निम्नवत् है-

1. वस्तु को दर्पण के बायाीें ओर स्थित माना जाता है।

2. सभी दूरियॉं दर्पण के ध्रुव से मापी जाती है।

3. दर्पण पर पॉलिस दायीं ओर से की जाती है।

4. प्रकाश किरण दर्पण पर बायीं ओर से आपतित होंती है।

5. आपतित किरण की दिशा मे मापी गई दूरियॉ धनात्मक तथा इसके विपरीत दिशा में मापी गई दूरियॉ ऋणात्मक मानी जाती है।

6. मुख्य अक्ष के लम्बवत् ऊपर की ओर मापी गई दूरियॉ धनात्मक तथा नीचे की ओर मापी गई दूरियॉं ऋणात्मक मानी जाती है।

7. दर्पण के ध्रुव से वस्तु की दूरी को u से, प्रतिबिंम्ब की दूरी को v से, फोकस दूरी को f से प्रदर्शित करते है। 

8. वस्तु की लम्बाई को O से तथा प्रतिबिम्ब की लम्बाई को I से प्रदर्शित करते है।

प्र.  किसी अवतल दर्पण के लिए सिद्ध कीजिए कि फोकस दूरी वक्रता त्रिज्या की आधी होती है?

अथवा

किसी अवतल दर्पण के लिए सिद्ध कीजिए कि f=R/2

माना MPN एक अवतल दर्पण जिसका ध्रुव P, फोकस F, वक्रता केन्द्र C तथा PC मुख्य अक्ष है। एक प्रकाश किरण AB मुख्य अक्ष के समान्तर आपतित होती है और परावर्तन के बाद मुख्य फोकस F से होकर चली जाती है। B और C को मिलाया जो दर्पण के बिन्दु B पर अभिलम्ब है। 
चित्र - 
परावर्तन के नियम से 
आपतन कोण = परावर्तन कोण
  ∠ ABC = ∠ CBF 
   ∠ABC =  ∠ BCF    ( AB, BC के समान्तर हैं।)
तुलना करने पर 
  ∠CBF = ∠BCF
तब 
BF = CF   ( समान कोण की सम्मुख भुजाये समान होती है.)
यदि दर्पण का द्वारक छोटा होआ तो बिंदु B बिंदु P के निकट होगा 

BF = PF
तुलना करने पर 
CF = PF
 दोनों पक्षों में PF जोड़ने पर 
CF + PF = PF + PF 
        PC = 2 PF
        -R = 2 (-f)   ( चिन्ह परिपाटी से )
        R  = 2f
          f = R/2
अतः किसी अवतल दर्पण के लिए  फोकस दूरी वक्रता त्रिज्या की आधी होती है?