August 14, 2025

अखंड भारत संकल्प दिवस Akhand Bharat Resolution Day

अखंड भारत संकल्प दिवस

1) 14 अगस्त 1947 को भारत का विभाजन हुआ था।

2) यह विभाजन पिछले 2500 वर्षों में भारत का 25वां विभाजन है।

3) अंग्रजो ने 1876 से 1947 तक भारत के 7 विभाजन किये।

4) अंग्रेजो द्वारा किये 7 विभाजन - 
अफगानिस्तान (1876)
नेपाल (1904)
भूटान (1906)
तिब्बत (1914)
श्रीलंका (1935)
म्यांमार (1937)
पूर्वी एवं पश्चिमी पाकिस्तान (1947) |

5) 1857 में भारत का क्षेत्रफल लगभग 83 लाख वर्ग किलोमीटर था वर्तमान में यह लगभग 33 लाख वर्ग किलोमीटर ही रह गया, मतलब लगभग 50 लाख वर्ग किलोमीटर भारत की भूमि विभाजन कर छीन ली गई।

6) 1948 में पाकिस्तान ने कश्मीर के 78114 वर्ग किलोमीटर भूभाग पर कब्जा कर इसमे से 5180 वर्ग किलोमीटर भूभाग चीन को दे दिया।

7) 1962 से चीन ने भारत की 43180 वर्ग किलोमीटर भूमि कब्जा की हुई है।

8) गांव-गांव, गली-गली जब जब मंदिरों में आरती होती है तो संकल्प दोहराया जाता है धर्म की जय हो, अधर्म का नाश हो...... "भारत अखंड हो"।

9) अखंड भारत की सीमा में ईरान, अफगानिस्तान, पाकिस्तान, बंग्लादेश, चीन, तिब्बत, नेपाल, भूटान, म्यांमार, मालदीव्स, फिलीपींस, थायलैंड, कंबोडिया, इंडोनेशिया, वियतनाम मध्य एशिया की मरु भूमि तक है।

10) यह बात दिल मे उतरे की "भारत अखंड हो सकता है", समय कितना भी लग सकता है 100-200 वर्ष भी लग सकते है। हमारा जीवन काल बहुत छोटा है, राष्ट्र का जीवन काल बहुत बड़ा है।

11) हमारी 100% सोच बने की अखंड भारत संभव है।

12) अखंड भारत का संकल्प नित्य मन में रखना चाहिए, एवं इसकी पूर्ति के लिए कार्य करना चाहिए।

13) हमें इस बात के लिए संकल्पित होना चाहिए की भारत के और अधिक विभाजन नहीं होने चाहिये।

अखंड भारत अवश्य होगा, आज जो असंभव लगता है वह भविष्य में संभव हो सकता है

  • 1857 स्वतंत्रता संग्राम के बाद स्वतंत्रता भी संभव नही लग रही थी, पर संकल्प दोहराया गया एवं 1947 में स्वंतत्रता प्राप्त हुई।
  • 500 वर्षों तक संकल्पित अयोध्या राम मंदिर भी आज बन चुका है।
  • कश्मीर में धारा 370 हटना भी संभव नही लग रहा था, आज बिना हिंसा के हट चुकी है।
  • द्वितीय विश्व युद्ध के बाद जर्मनी का विभाजन पूर्व एवं पश्विमी जर्मनी के रूप में हुआ, 1989 में बर्लिन की दीवार टूटी एवं 1990 में दोनों एक देश हो गए।
  • यहूदियों को अपना देश इस्राइल छोड़कर विस्थापित होना पड़ा, यहूदीयो ने 1800 वर्षों तक अपनी संकल्प दोहराते रहे एवं संघर्ष कर अपना देश इस्राइल को प्राप्त किया।

desh hamen deta hai sab kuchh..........

देश हमें देता है सब कुछ..........

देश हमें देता है सब कुछ, हम भी तो कुछ देना सीखें ।।
सूरज हमें रोशनी देता, हवा नया जीवन देती है, 
भूख मिटाने को हम सबकी, धरती पर होती खेती है, 
औरों का भी हित हो जिसमें, हम ऐसा कुछ करना सीखें ।1।
देश हमें देता है सब कुछ..........



पथिकों को तपती दुपहर में, पेड़ सदा देते हैं छाया, 
सुमन सुगंध सदा देते हैं, हम सबको फूलों की माला,
त्यागी तरुओं के जीवन से, हम परहित कुछ करना सीखे ।2
देश हमें देता है सब कुछ..........

जो अनपढ़ हैं उन्हें पढ़ायें, जो चुप हैं उनको वाणी दें, 
पिछड़ गये जो उन्हें बढ़ायें, प्यासी धरती को पानी दें, 
हम मेहनत के दीप जलाकर,  नया उजाला करना सीखें ।।3।।
देश हमें देता है सब कुछ..........

सुभाषित - 1 Shubhashit

येषां न विद्या न तपो न दानं

ज्ञानं न शीलं न गुणो न धर्मः।

ते मृत्युलोके भुवि भारभूता

 मनुष्यरूपेण मृगाश्चरन्ति॥

श्लोकार्थ - जिनके पास विद्या, तप, दान, ज्ञान, शील, गुण और धर्म ये नहीं होते हैं, वे पृथ्वी पर भार स्वरूप मनुष्य रूप में पशु के समान विचरण करते हैं।


गीत - सूत्रपात नवयुग बेला का ......

सूत्रपात नवयुग बेला का, संवाहक हम सभी बनें।

कठिन परिश्रम और लगन से, नवयुग की पहचान बनें-2

राष्ट्र प्रथम जीवन में अपने, हर मन का उद्देश्य रहे।
गौरव बढ़े देश का जिससे, यह जन - मानस लक्ष्य रहे।
नवयुग की इस नव गंगा के, जल-कण पावन सभी बनें।।
कठिन परिश्रम...............................................
उत्सुक सज्जन सुप्त शक्ति का, लाना होगा नवल प्रवाह।
संचित शक्ति अथाह हिन्दु की, प्रगटे यह जन-जन की चाह
सुदृढ़ हो विस्तार कार्य सब, गति देकर उत्थान करें ।।
कठिन परिश्रम................................................
जागृति श्रद्धा बढ़े धर्म में, शीलवान परिवार सभी।
पर्यावरण प्रफुल्लित करके, समरसता की राह गही ।
शिष्टाचार स्वदेशी अपने, अधिष्ठान की आन बनें।।
कठिन परिश्रम................................................
पश्चिम के चिंतन से थककर, विश्व विवश भारत की ओर।
बढ़ी राष्ट्र की शक्ति सनातन, उठा गगन में स्वर घनघोर।
चलो बढ़ें अब कर्म क्षेत्र में, गुरुता के प्रतिमान बनें।।
कठिन परिश्रम................................................
सूत्रपात नवयुग बेला का, संवाहक हम सभी बनें।
कठिन परिश्रम और लगन से, नवयुग की पहचान बनें-2


गीत - राष्ट्र-धर्म-कर्तव्य मार्ग पर……………

राष्ट्र-धर्म-कर्तव्य मार्ग पर निशि-दिन बढ़ते जाएंगे । 

अपनी भारत माता को हम जग सिरमौर बनाएंगे ।।

 

राणा, लाचित, छत्रसाल और चेन्नमा की शक्ति हम । 

नायन्मार, आलवारों, नरसी-चैतन्य की भक्ति हम । 

शक्ति-भक्ति-युक्ति से अब हम, प्रगति शिखर तक जाएंगे ।।1।

अपनी भारत माता को हम जग सिरमौर बनाएंगे ।।

 

मर्यादा श्रीराम से लेकर सीता सती से तप लेकर 

गुरू नानक, महावीर, बुद्ध से सत्यशांति और जप लेकर

सकल विश्व में त्याग-शील और प्रेम सुधा सरसाएंगे ।।2।।

अपनी भारत माता को हम जग सिरमौर बनाएंगे ।।

 

चंद्रयान ने चांद पर जाकर ध्वजा तिरंगा फरहाया । 

गगनयान ने अंतरिक्ष में भारत का गौरव गाया । 

ज्ञान और विज्ञान के बल पर विश्व गुरू कहलाएंगे ।।3।।

अपनी भारत माता को हम जग सिरमौर बनाएंगे ।।


गीत - हम भारत मां की संताने …......

हम भारत मां की संताने, हम मातृभूमि हित जीते हैं । 

हम शूरवीर हम भरत - पुत्र, सिंहों से खेला करते हैं ।  ध्रु. प.

 

इस भूमंडल पर भारत ही, विश्वगुरू कहलाया है , 

भारत ने सारे जग को , जीने का ढंग सिखाया है । 

ज्ञानी ऋषि - मुनियों की हम , कर जोड़ वंदना करते हैं । 

हम शूरवीर हम भरत - पुत्र …………………... ।। 1 ।। 

 

देश के हित सर्वस्व लुटा दें, ऐसे हम बलिदानी हैं 

अपनी शक्ति से शत्रु को, याद दिलाने नानी हैं । 

सुन शौर्य पराक्रम की गाथा, यमराज भी हम से डरते हैं । 

हम शूरवीर हम भरत - पुत्र …………………... ।। 2 ।। 

 

अपने कौशल से शत्रु को, धूल चटाई है हमने 

इतिहास गवाही देता है, नहीं पीठ दिखाई है हमने 

दुश्मन की गोली को अपने, सीने पर झेला करते हैं 

हम शूरवीर हम भरत - पुत्र …………………... ।। 3 ।।

August 10, 2025

बोध कथा -आज्ञाकारी शिष्य Moral Story - Obedient disciple

प्राचीन वैदिक युग की गुरूकुल परम्परा में 'महिर्षि आयोदधौम्य' के आश्रम में अनेक शिष्य अध्ययन करते थे। गुरू के प्रति श्रद्धा, विद्याभ्यास में तत्परता तथा ब्रह्मचर्यपूर्वक कर्तव्यनिष्ठा के सांचे में ढले हुए उन छात्रों के लिए गुरूवर धौम्य की आज्ञा ही वेदवाक्य थी। प्रातःकाल यज्ञादि के लिए कुश लाना, बस्ती में जाकर मिक्षाटन करना, आश्रम पर गायों की रखवाली करना, उनका नित्य कर्म था। वर्षा ऋतु आ गयी थी। एक दिन तेज वर्षा के कारण गुरूजी के खेत की मेढ़ टूट गई। यदि पानी का बहाव न रोका गया तो खेती नष्ट होने की आशंका थी। गुरू की चिंता देख उनके 'शिष्य आरूणि' ने गुरू की आज्ञा ली और मेंढ़ ठीक करने में जुट गया। अचानक वर्षा का वेग तेज हो गया। मिट्टी और पत्थर लगाकर जितनी मेंढ़ आरूणि ने बना दी थी, उसके भी टूटने का खतरा था। दिन दल चुका था। ठण्ड बढ़ रही थी। वर्षा रूकने का नाम नहीं ले रही थी पानी के बहाव को रोकने का कोई उपाय न देख आरूणि खुद ही खेत की मेंढ़ बनकर लेट गया। खेत में पानी आना बन्द हो गया, लेकिन ठण्ड और वर्षा के पानी के कारण आरूणि ठिदुर कर मूर्छित होकर पड़ा रहा। रात बीती, दूसरा दिन उगा। अध्ययन-वेला में आरूणि को न  देख गुरूवर चिन्तित हो गए। आरूणि को खोजते हुए मेंढ़ पर गए तो आरूणि को मूर्छित अवस्था में मेंढ़ पर लेटे देखा। उसे उठाकर आश्रम में लाए और उसका उपचार किया। आरूणि को जब होश आया तो गुरूजी ने बरसती आँखों से उस पर स्नेह की वर्षा की और दोनों हाथों से उठा हृदय से लगा लिया। आरूणि यह स्नेह पाकर धन्य हो गया। गद-गद कण्ठ से उसे आशीर्वाद देते हुए गुरू धौम्य ने कहा- 'बेटा आरूणि। तुम श्रद्धा और कर्तव्य निष्ठा के मूर्तरूप बन गए हो। अब तुम्हें सुपात्र मानकर सारी विद्याएँ स्वतः ही प्राप्त हो जाएँगी। गुरूदेव का आशीर्वाद फलीभूत हुआ और बिना अध्ययन के ही आरूणि वेद-वेदांग और समस्त विद्याओं के पारंगत विद्वान बन गए। उनके व्यक्तित्व में श्रद्धा, तत्परता और इन्द्रिय निग्रह की त्रिवेणी साकार थी, जो प्राचीन गुरूकुल परम्परा का आधार थी।


मुझे अंग्रेजों की गुलामी नहीं करना है सुभाष बाबू I don't want to be a slave to the British, Subhash Babu


सुभाष बाबू को उनके पिता ने भारत से हटाने के लिए आई.सी.एस. की परीक्षा में प्रवेश की तैयारी हेतु लन्दन जाने का आदेश दिया। सुभाष यह सुनकर उगे से रह गए। उन्होंने एक बार प्रयास किया किया कि उन्हें यहीं रहकर स्नातकोत्तर अध्ययन की अनुमति मिल जाए। किन्तु पिता ने इसे सुभाष के सामने इस रूप में रखा कि वह परीक्षा से घबराता है। अतः अन्त में इस कलंक को मिटाने हेतु लंदन जाने को सुभाष तैयार हो गए। लंदन में शीघ्र ही उनकी कुशाग्र बौद्धिक क्षमता एवं कुशल व्यवहार के कारण उनके कई अच्छे मित्र बन गए।

वे वहाँ परीक्षा मे शामिल हुए और कुछ समय पश्चात् परिणाम भी आ गए। सुभाषचन्द्र बोस के मित्र उनका परिणाम लेकर अत्यन्त उल्लास के साथ उनसे आकर मिले। किन्तु यह क्या। उत्तीर्ण परिणाम और वह भी सर्वोच्च  परीक्षा का, फिर भी सुनकर वे तनिक भी प्रसन्न नहीं हुए। मित्रों ने उनसे  पूछा, तो उन्होंने सहज भाव से कह दिया कि मुझे नौकरी नहीं करनी है। तुरन्त उन्होंने त्याग-पत्र लिख दिया। त्याग-पत्र का समाचार, समाचार-पत्रों के माध्यम से अधिक गति से फैल गया कुछ अंग्रेज अधिकारी उनसे मिले और आश्चर्य के साथ पूछा- "आप ऐसा क्यों कर रहे हैं। उन्होंने दृढ़ मन से कहा कि "मैं ब्रिटिश सरकार के अधीन रहकर अपने कर्तव्यों का निर्वाह उचित प्रकार से नहीं कर सकूँगा, यह मैं भलि भांति जानता हूँ। इसलिए त्याग-पत्र देने का मैंने पहले से ही निश्चय कर लिया था। विदेशी सरकार के अधीन रहकर में मातृ‌भूमि की सेवा कैसे कर सकता हूँ।

मुझे नहीं चाहिए वे लड्डू



उस दिन राजा के जन्मदिन के निमित्त छुटियाँ थी। स्कूल आदि सभी बंद थे। मैं जब बाहर से लौटा, तो परछी के आले में मैंने दोने में लड्डू पड़े हुए पाए। पता लगाने पर मालूम हुआ की केशव को बादशाह के जन्मदिन के निमित्त पाठशाला में बांटे गए लड्डू मिले थे, उन्हें वहीं फेंककर वह अन्दर कमरे में जाकर सोया है। मैं कमरे में गया और केशव से कहा- "अरे यह लड्डू क्यों फेंक दिए? केशव ने कहा- "मुझे नहीं चाहिए वे लड्डू।" क्यों? परकीय राजा के जन्मदिन के निमित्त मिले लड्डू खाकर आनंद व्यक्त करना मुझे अच्छा नहीं लगता। ठीक-ठीक ऐसा कहते हुए मैं वापस लौटा। उस समय केशव की आयु 8-9 वर्ष की होगी। किन्तु उस आयु में भी उसके अन्तःकरण की यह देशप्रेम की भावना देखकर मुझे प्रसन्नता हुई।


भारत माता सबकी माता


1988 की गीता जयंती का दिन। केरल में बाल गोकुलम के बच्चों ने अपनी पुस्तकों को घरों में जाकर बेचने का एक व्यापक अभियान छेड़ा। टोलियों में बच्चे घर-घर जाकर साहित्य बेचने लगे।

एक मुस्लिम घर में माता भारत माता का चित्र खरीदना चाहती थी। उसके पुत्र ने माँ को टोकते हुए कहा "भारत माता तो हिन्दुओं की माता है। मुसलमानों से उसका क्या नाता? हम मूर्ति पूजक थोड़े ही हैं। इस्लाम मजहब इस प्रकार की तस्वीरों को घरों में टांगने की स्वीकृति नहीं देता।" माता दुविद्या में पड़ गयी। तभी बाल गोकुलम की एक छोटी सी बालिका ने मुस्लिम युवक को लताड़ते हुए कहा- "ऐसा फिर न कहना। हिन्दुओं की भांति आप भी इस देश का अन्न, जल और वायु ग्रहण करते हैं। देखो भाई, जो भारत में जन्मा है, वह उसकी माता है। उसका यह कहना कि भारत मेरी माता नहीं, हमें ठीक नहीं लगा। अच्छा, क्षमा करें, हम जाते हैं।" युवक की तो जैसे बोलती ही बंद ही गयी। उसे कोई भी उत्तर नहीं सूझ रहा था। माता ने उस बालिका से कहा- "बेटी, मेरे बेटे ने जो भी कहा है उस पर ध्यान मत देना। यह चित्र मुझे दे दो। भारत माता तो सब की माता है।" निश्चय ही कवि ने ठीक कहा है-

खा अन्न और जल तेरा माँ, ये अंग सकल हैं बड़े हुए।
तेरी ही वायु से माता, ये श्वास अभी तक अड़े हुए।।

आत्मनिर्भर होना अनिवार्य है

जैसे सिंह धरती का राजा है, उसी प्रकार गरुड़ पक्षी को आकाश का राजा माना जाता है। एक गरुड़ पक्षी अपने आलसी बेटे को उड़ना व अपना खाना खुद तलाशना सिखाना चाहता था। छोटा गरुड़ कठिनाइयों में घिर जाता पर उड़ना न सीखता। गरुड़ रोज उसे पीठ पर बिठा कर दाना चुगाने ले जाता पर छोटा गरुड सीखना ही न चाहता था।

यह क्रम बहुत दिन चला। गरुड़ ने बहुतेरा कहा, पर बच्चे ने उड़ना न सीखा। उसकी सोच यह थी कि जब आराम से काम चल रहा हो तो स्वयं श्रम क्यों किया जाए। गरुड़ अपने बच्चे की इस दुर्बलता को बड़ी सावधानी से देखता रहा।

एक दिन जब वह आकाश में उड़ रहा था, तब गरुड़ ने धीरे से अपने पंख खींच लिए। बच्चा गिरने लगा तब उसे चेत आया, फड़फडाया, गिरते-फिरते बचा, पर अब उसने उड़ना सीखने की आवश्यकता अनुभव कर अपने पंख फड़फडाए और किसी तरह उड़ना सीख ही लिया। सायंकाल बालक गरुड़ ने माँ से कहा, "माँ, आज पंख न फड़फडाए होते तो पिताजी ने तो बीच में ही गिरा दिया होता।"

माँ गरुड़ हँसी और बोली, "बेटे, जो अपने आप नहीं सीखते, आत्मनिर्भर नहीं बनते उन्हें सिखाने का यही तरीका है।"

बोधकथा - अक्रोधी और सत्यवादी युधिष्ठर akrodhee aur satyavaadee yudhishthar

प्राचीन समय में इस आर्यावर्त देश में यमुना नदी के तट पर हस्तिनापुर नाम की एक सुन्दर नगरी बसी हुई थी। एक समय राजा धृतराष्ट्र यहाँ पर राज्य करते। इनके एक सौ एक पुत्र थे, जो कौरव कहलाते थे। इनमें सबसे बड़े दुर्योधन थे। इसी प्रकार राजा धृतराष्ट्र के भाई पांडू के भी पांच पुत्र थे, जो पाण्डव कहलाते थे। इनमें सबसे बड़े युधिष्ठर थे। ये सब राजकुमार गुरु द्रोणाचार्य से पढ़ते थे।


एक बार गुरु द्रोणाचार्य ने उन सबको यह पाठ पढ़ाया की क्रोध कभी  नहीं करना चाहिए, और सदा सच बोलना चाहिए। गुरु ने आज्ञा दी कि इस पाठ को खूब याद कर कल सुनाएँ। अगले दिन गुरूजी ने सब राजकुमारों को पिछला पाठ सुनाने को कहा। बाकि सबने तो अपना पाठ सुना दिया, लेकिन युधिष्ठर ने कहा- गुरुदेव । मुझे अभी पाठ याद नहीं हुआ। गुरुजी ने कहा-अच्छा कल सुना देना।

अगले दिन फिर गुरूजी ने युधिष्ठर से पाठ पूंछा पर उसने फिर भी यही कहा- मुझे अभी पाठ याद नहीं हुआ। एक-एक करके सात दिन बीत गए। युधिष्ठर मन लगाकर पाठ याद करते रहे। अब आठवें दिन जब गुरूजी ने युधिष्ठर से पाठ सुनाने को कहा तो उन्होंने फिर वही शब्द कहे। अब तो गुरूजी के क्रोध की सीमा न रही और लगे उसे पीटने । पर युधिष्ठर ने उस दण्ड को प्रसन्न्तापूर्वक सहन किया। अन्त में जब गुरूजी का क्रोध शांत हुआ, युधिष्ठर हाथ जोड़कर कहने लगे - गुरुदेव अब मुझे पाठ का पहला भाग क्रोध कभी नहीं करना चाहिए याद हो गया है। क्योंकि आपने मुझे बहुत पीटा, पर मुझे क्रोध नहीं आया, परन्तु इसका पिछला भाग सदा सच बोलना चाहिए का अभी अभ्यास कर रहा है। जब इसे अपने जीवन में उतर लेगा, तब यह पाठ भी सुना दूँगा। सुनकर द्रोणाचार्य बड़े प्रसन्न हुए। उन्होंने मन में विचार किया जिसके इतने उत्तम विचार हैं, वह एक दिन अवश्य महान पुरुष बनेगा।

जीवन-भर युधिष्ठर ने इन दोनों व्रतों को निभाया। कभी क्रोध नहीं किया और सच ही बोलते रहे। इन्ही बातो से उन्हें धर्मराज युधिष्ठर कहते हैं।


बोधकथा - मन की एकाग्रता concentration of mind

एक दिन स्वामी विवेकानंद नदी के किनारे टहल रहे थे। उन्होंने देखा कि कुछ नवयुवक पुल पर खड़े होकर पानी की लहरों में तैर रहे गेंदों पर निशाना लगा रहे हैं।

सभी गेंदे एक धागे में बंधे हुए थे। दूसरे किनारे पर एक पत्थर बंधा हुआ था जिसके परिणाम स्वरुप वे पानी के बहाव में बह नहीं सकते थे। बड़ी देर से स्वामी जी उन नवयुवकों के असफल प्रयास को देखकर खड़े - खड़े मुस्करा रहे थे।

लहरों के कारण वे गेंदे लगातार इधर इधर हिल डुल रहे थे। अतः निशाना ठीक लगता नहीं था। वास्तव में काम बहुत ही कठिन था। एक युवक ने स्वामी जी को मुस्कराते हुए देख लिया। वह व्यंगात्मक आवाज में बोला, "आप हम पर हँस रहे हैं। मगर निशाना लगाना सरल काम नहीं है। आप में क्षमता हो तो आप ही निशाना लगाकर दिखा दीजिए।"

स्वामी विवेकानंद ने उसी स्वाभाविक ढंग से मुस्कुराते हुए कहा, "लाओ भाई, जरा मैं भी प्रयास करके देखता हूँ।"



उस नवयुवक ने आश्चर्य से देखा कि स्वामी जी ने एक-दो नहीं लगभग सभी गेंदों पर निरंतर सफल निशाने लगाकर दिखाये। अब तो युवक उनकी प्रतिभा पर चकित रह गये। सभी एक स्वर में बोले "लगता है कि आप एक सफल निशानेबाज है। स्वामी विवेकानंद के मुखमंडल पर पुनः मुस्कान थिरक उठी। वे बोले "नहीं भाई, मैंने बन्दूक अपने जीवन में पहली बार उठायी है।" फिर यह बतलाया कि, "लक्ष्य साधने की सफलता अभ्यास से अधिक मन की एकाग्रता पर निर्भर करती है।

Concentration Of Mind

One day Swami Vivekananda was strolling on the bank of a river. He saw some young men standing on a bridge aiming at the balls floating in the waves of water.

All the balls were tied to a thread. A stone was tied on the other end due to which they could not be swept away by the flow of water. For a long time Swamiji was standing and smiling seeing the unsuccessful attempts of those young men.

Due to the waves those balls were constantly moving here and there. Hence the aim was not accurate. In reality the task was very difficult. One young man saw Swamiji smiling. He said in a sarcastic voice, "You are laughing at us. But aiming is not an easy task. If you have the ability then you yourself aim and show it."

Swami Vivekananda said smiling in the same natural manner, "Let me also try brother."

That young man saw with surprise that Swamiji showed successful aiming not on one or two but on almost all the balls continuously. Now the youth were astonished at his talent. All of them said in one voice, "It seems that you are a successful marksman." A smile again danced on Swami Vivekananda's face. He said, "No brother, I have picked up a gun for the first time in my life." Then he said, "The success of hitting the target depends more on concentration of mind than practice."

ईमानदारी



"अरे नाना, भूल हो गयी।" बाजार से घर लौटते समय अचानक ठिठक कर पं. दीनदयाल उपाध्याय ने श्री नानाजी देशमुख से कहा- मेरी जेब में चार पैसे थे, जिनमें एक पैसा खोटा था। दो पैसे शाक-भाजीवाले उस बूढ़ी के पास चला गया है। चलो, वापस जाकर उसे अच्छा पैसा दे आयें।" यह घटना तब की है जब दीनदयाल जी एम.ए. पढ़ने और नानाजी शाखा प्रारंभ करने आगरा गये थे और साथ- साथ रहते थे। उनके मुख पर अपराधी का भाव था। शाकवाली की जब उन्होंने बात बताई तो उसने कहा- "अरे, अब कौन तुम्हारे खोटे पैसे को खोजने बैठेगा? जाओ, जाओ जो दिया है वाही ठीक है।" पर दीनदयाल जी कहाँ मानने वाले थे। उन्होंने उस वृद्धा के पैसों के ढेर में से खोज - खोज कर अपना खोटा पैसा ढूँढ ही निकाला। उसके बदले उस को एक खरा पैसा देने के बाद उनके मुख पर तृप्ति का भाव झलक उठा। बूढ़ी अम्मा भी प्रशन्न हो गयीं, बोलीं- भगवान तेरा भला करें।"

संतुष्ठी ईमानदारी का सबसे बड़ा इनाम है।

सत्यवादिता



विद्यार्थियों को उनके गणित के अध्यापक ने घर से हल करके लाने के लिए कुछ प्रश्न दिये। एक लड़के ने अन्य सारे प्रश्न तो सही - सही कर लिये, केवल एक प्रश्न को हल करने में उसे एक मित्र की सहायता लेनी पड़ी।

अगले दिन कक्षा में इसी विद्यार्थी के सब उत्तर सही देखकर अध्यापक ने  बड़ी प्रशंसा की और अपना पेन पुरस्कार में देने लगे।

किन्तु यह क्या । वह विद्यार्थी फूट-फूट कर रोने लगा "गुरूजी, मैंने इनमें से एक प्रश्न अपने मित्र की सहायता से हल किया है। मैंने सरे प्रश्न कहाँ हल किये हैं। मैंने तो आपको धोखा दे दिया। मैंने तो आपको धोखा दे दिया। मुझे पुरस्कार नहीं, दंड मिलना चाहिए।"

अध्यापक महोदय उस बालक की सच्चाई से बहुत प्रशन्न हुए। उनहोंने कहा- "अब यह पुरुस्कार में तुम्हें तुम्हारी सत्यवादिता के लिए देता हूँ।" यही बालक आगे चलकर गांधीजी के राजनीतिक गुरु गोपालकृष्ण गोखले के नाम से संसार में प्रसिद्ध हुआ।


गलियों से मुँह दूषित (गंदा)


एक बार मदनमोहन मालवीय और रमापति मिश्र के बीच क्रोध पर चर्चा हो रही थी। मिश्र जी अपने को अत्यंत ही संतुलित, अक्रोधी तथा सौम्य व्यक्त्ति समझते थे। उनहोंने मालवीय जी से कहा- "आप मुझे 100 गालियाँ देकर देखिए। मैं थोडा भी विचिलित नहीं होऊंगा और न ही मुझे क्रोध आएगा।"

मालवीय जी मुस्कुराने लगे और बोले- "यह मैं नहीं कर पाऊंगा. क्योंकि आप की सहनशक्ति की परीक्षा तो सौ गालियां देने के पश्चात् निश्चित होगी, पर मेरा मुँह तो एक गाली देने के बाद गंदा हो जायेगा।"

मिश्र जी मालवीय जी की ओर देखते रह गये और मन ही मन अभिवादन किया।

बोध कथा सागर की लहरों को संबोधन

नगर में एक प्रसिद्ध नेता का भाषण हुआ। एक युवक ने भी उस भाषण को सुना। वह इतना अभिभूत हुआ इस भाषण को सुनकर की वह सोचने लगा-"क्या में भी ऐसा भाषण कर पाउँगा कभी?" उसका नाम था डीमास्थनीज।

कठिनाई यह थी कि वह तुतलाता था, हकलाता था। डीमास्थनीज ने अच्छा वक्ता बनने की इच्छा के पीछे दृढ संकल्प खड़ा कर दिया। यहएकांत में समुद्र के किनारे चला गया। सागर की लहरों को संबोधित कर 
वह बोलने लगा। उसे न तो वहाँ कोई भय था और न ही हिचकिचाहट। पर हकलाहट कैसे दूर हो?

उसने नियमित और अलग-अलग तरीकों से बोलने का निरंतर अभ्यास किया। एक तरीका काम न आया तो दूसरा, वह काम न आया तो तीसरा, पर वह लगन से अपने काम में लगा रहा।

निश्चय पक्का हो, जी-जान से प्रयास किया जाए तो मनुष्य क्या नहीं कर सकता है? डीमास्थनीज एक दिन प्रभावशाली भाषण करने वाले के रूप में विख्यात हो गया।




August 08, 2025

संस्कृत भाषा का महत्व

संस्कृतभाषायाः महत्त्वम्
संस्कृत भाषा का महत्व
(म. प्र. 2022, 23, 25, प्रश्न बैंक)

1. संस्कृतभाषा विश्वस्य सर्वासु भाषासु प्राचीनतमा सर्वोत्तमसाहित्यसंयुक्ता चास्ति । 
संस्कृत विश्व की सभी भाषाओं में सबसे प्राचीन है और इसका साहित्य सर्वश्रेष्ठ है। 
2. संस्कृता परिशुद्धा व्याकरण सम्बन्धिदोषादि रहिता संस्कृतभाषेति निगद्यते। 
संस्कृत को व्याकरण संबंधी त्रुटियों से मुक्त शुद्ध संस्कृत भाषा कहा जाता है।
3. प्राचीने समये एषैव भाषा सर्वसाधारणा आसीत्। 
प्राचीन काल में यह आम भाषा थी। 
4. सर्वे जनाः संस्कृतभाषाम् एव वदन्ति स्म। 
सभी लोग केवल संस्कृत ही बोलते थे। 
5. एषा एव अस्माकं पूर्वजानाम् आर्याणां सुलभा, शोभना, गरिमामयी च वाणी। 
यही है हमारे महान पूर्वजों की सहज, सुंदर और गरिमामयी वाणी। 
6. संस्कृतभाषायामेव विश्वसाहित्यस्य सर्वप्राचीनग्रन्थाः चत्वारो वेदाः सन्ति येषां महत्त्वमद्यापि सर्वोपरि वर्तते। 
संस्कृत में ही विश्व साहित्य के प्राचीनतम ग्रंथ, चारों वेद समाहित हैं, जिनका आज भी अत्यधिक महत्व है। 
7. भास-कालिदास-अश्वघोष-भवभूति-दण्डि-सुबन्धु-बाण-जयदेव प्रभृतयो महाकवयो नाटकाराश्च संस्कृतभाषायाः एव। जीवनस्य सर्वसंस्कारेषु संस्कृतस्य प्रयोगः भवति। 
भास, कालिदास, अश्वघोष, भवभूति, दंडी, सुबंधु, बाण, जयदेव आदि महान कवि और नाटककार संस्कृत से हैं। जीवन के सभी अनुष्ठानों में संस्कृत का प्रयोग होता है। 
8. अधुनाऽपि सङ्गणकस्य कृते संस्कृतभाषा अति उपयुक्ता अस्ति। 
आज भी कंप्यूटर का उपयोग होता है। संस्कृत इसके लिए बहुत उपयुक्त है। 
9. संस्कृतभाषैव भारतस्य प्राणभूताभाषा अस्ति राष्ट्रस्य ऐक्यं च साधयति। 
संस्कृत भारत की जीवनदायिनी है और राष्ट्र की एकता को प्राप्त करती है। 
10. भारतीय गौरवस्य रक्षणाय एतस्याः प्रसारश्च सर्वेरेव कर्त्तव्यः अत एव उच्यते - 'संस्कृतिः संस्कृताश्रिता ।'
भारतीय गौरव को संरक्षित करना और उसका प्रसार करना सभी का कर्तव्य है और इसीलिए कहा गया है - 'संस्कृति संस्कृत पर निर्भर है।'

August 05, 2025

नन्हे-मुन्ने भोले-भाले nanhe munne bhole bhale

 नन्हे-मुन्ने भोले-भाले शूरवीर हम सच्चे हैं।
सिंहों के संग खेले हैं हम, भारत माँ के बच्चे हैं।। (ध्रु.प).

मैनावती हकीकत जैसे, वीरव्रती बलिदानी हैं।
ध्रुव प्रहलाद से भक्त और, ऋषि-मुनियों से ज्ञानी हैं।
देश की सेवा करते हैं हम, देश के सैनिक सच्चे हैं ।।
सिंहों के संग खेले हैं हम ...........................।। 1।।

जाति-पाति और ऊँच-नीच का, भेद नहीं हम करते हैं
सब समाज के कष्टों को हम, अपना दुःख समझते हैं ।
मानवता मन में धारें हम, भले आयु में बच्चे हैं ।।
सिंहों के संग खेले हैं हम...........................।। 2।।

दुःख-दैन्य का तमस चीर कर, जग को राह दिखाएंगे।
भारत के वैभव का ध्वज,हम दुनिया में फहरायेंगे ।
राम-कृष्ण के वंशज हैं हम, गुरू गोविन्द के बच्चे हैं।।
सिंहों के संग खेले हैं हम............................।। 3।।

 नन्हे-मुन्ने भोले-भाले शूरवीर हम सच्चे हैं।
सिंहों के संग खेले हैं हम, भारत माँ के बच्चे हैं ।।


कदम निरन्तर चलते जिनके……. kadam nirntar chalte jinke


 कदम निरन्तर चलते जिनके, श्रम जिनका अविराम है।
विजय सुनिश्चित होती उनकी, घोषित यह परिणाम् है॥ ध्रुव पद

                                                                                                 घोषित यह परिणाम् है

लौकिक और अलौकिक बन्धन, जिनको बांध नहीं पाते
घिरें विघ्न बाधाएं फिर भी, तनिक नही वे घबराते।
मान चुनौती करें सामना, यह जीवन संग्राम हैं।

विजय सुनिश्चित होती …………………………

साहस सम्बल होता जिनका, धैर्य सारथि होता है।
लोक हितैषी बनकर अपने, प्राणों को भी खोता है।
इतिहास सदा लिखता पृष्ठों पर, उनका स्वर्णिम नाम है।

विजय सुनिश्चित होती …………………………

कालचक्र के माथे पर जो पौरुष की भाषा लिखते।
उनकी मृत्यु कभी नही होती, वे केवल करते दिखते।
मातृभूमि की पावन गीता, गाते आठों याम है।

विजय सुनिश्चित होती …………………………


राणा प्रताप की साधना

इतिहास में राणा प्रताप ने मरने की साधना की थी, एक तरफ थी दिल्ली के कुटिल अकबर की महाशक्ति, जिस के साथ वे भी थे जिन्हें उसके साथ होना था, वे भी थे जिन्हें राणा प्रताप के साथ होना था।

बुद्धि कहती थी टक्कर असम्भव है गणित कहता था विजय असम्भव है समझदार कहते थे रूक जाओ रिश्तेदार कहते थे झुक जाओ

राणा प्रताप न बुद्धि की बात को गलत मानते थे, न गणित के विरोधी थे, न समझदारों का प्रतिवाद करते थे, न रिश्तेदारों को इंकार, पर क्या कहते थे ?

राणा प्रताप कहते थे- जब मनुष्य की तरह सम्मान से जीना असम्भव हो जाये तब कम से कम हम मनुष्य की तरह सम्मान से मर तो सकते हैं। बिना कहे ही शायद उनके मन में था कि मनुष्य की तरह सम्मान से मरकर हम आने वाली पीढ़ियों के लिये जीवन द्वार खुला छोडें। कुत्तों की तरह दुम हिलाकर जीते हुये उस द्वार को बन्द न कर जायें।

भतग सिंह

August 04, 2025

पूजनीय कौन

एक मंदिर में स्थापित पत्थर प्रतिमा पर चढ़ाए गए पुष्प ने क्रोधित होकर पुजारी से कहा, तुम प्रतिदिन इस पत्थर प्रतिमा पर मुझे चढ़ाकर इसकी पूजा करते हो। वह मुझे कतई पसंद नहीं है। पूजा मेरी होनी चाहिए क्योंकि मैं कोमल, सुन्दर, सुवासित हूँ। वह तो मात्र पत्थर की मूर्ती है।

मंदिर के पुजारी ने हँसते हुए कहा, हे पुष्प, तुम कोमल, सुन्दर, सुगन्धित अवश्य हो पर तुम्हें ईश्वर ने ऐसा बनाया है। ये गुण तुम्हें सहजता से प्राप्त हुए हैं। इनके लिए तुम्हें कोई श्रम नहीं करना पड़ा है। पर देवत्व प्राप्त करना बड़ा कठिन काम है। इस देव प्रतिमा का निर्माण बड़ी कठिनाई से किया जाता है। एक कठोर पत्थर को देव प्रतिमा बनने के लिये हजारों चोटें सहनी पड़तीं हैं। चोट लगते ही अगर यह टूट के बिखर जाता तो शायद यह कभी देव प्रतिमा नहीं बन सकता था। एक बार अगर कठोर पत्थर देव प्रतिमा में ढल जाए तो लोग उसे बड़े आदर भाव से मंदिर में स्थापित कर प्रतिदिन उसकी पूजा अर्चना करते हैं। इस पत्थर की सहनशीलता ने ही इसे देव प्रतिमा के रूप में पूजनीय तथा वन्दनीय बना दिया है।

यह सुनकर पुष्प मुस्कुरा दिया। वह समझ गया की कठिन परीक्षा को सफलतापूर्वक पार करने वाला ही देवत्व प्राप्त करता है।

बोध कथा - समर्पण


संत कबीर ने एक आदर्शवादी जीवन जिया। उनकी बेटी की शादी थी। पास में पैसा नहीं था। बेटी की शादी के दिन निकट आ गए थे। उन्होंने सोचा कि थोडा कपडा बुना है। उसी को बेचकर कुछ पैसे की व्यवस्था की जाए ताकि कुछ तो व्यवस्था हो। वे कपड़ा कंधे पर रखकर दोपहरी में बेचने निकले। धुप तेज थी, रास्ते में एक बृक्ष देखकर उसके नीचे छाँव लेने बैठ गए। इतने में सामने से एक पथिक आया और वह भी पेड़ के नीचे बैठकर छाँव लेने लगा। कबीर ने पुछा कहो भाई। तुम इतनी धूप में कहाँ जा रहे हो? पथिक ने कहा- मैं तो कबीर के पास जा रहा हूँ। कबीर ने पथिक से पूँछा- उनसे क्या काम है? पथिक ने कहा- देख नहीं रहे हो, मेरी धोती फट गयी है। इतनी फट गयी हैं कि इससे लाज बचाना मुश्किल हो गया है। कबीर ने साथ में लिए कपडे में से उसको धोती के लिए कपड़ा फाड़कर दे दिया। कपड़ा पाकर वह बहुत खुश हुआ और कहा- अच्छा हुआ धोती तुमने दे दी, अब गमछा कबीर से मांग लूँगा ताकि स्नान के बाद धोती बदलने में सुविधा हो। कबीर ने कपड़े में से गमछा भी फाड़कर दे दिया। पथिक ने कहा - धोती गमछा तुमने दे दिया, अब कमीज का कपड़ा कबीर से मांग लूँगा। इतना सुनते ही कबीर ने बचा हुआ कपड़ा पथिक को दे दिया और कहा कि इसकी कमीज बनवा लेना। कबीर खाली हाथ घर लौट आए। कबीर के मन में बेटी की शादी से भी अधिक चिंता दीन-दुखियों के लिए थी। आदर्शवादी और ध्येयवादी की मूल प्रवृति परोपकारी होती है।