August 10, 2025

बोध कथा -आज्ञाकारी शिष्य Moral Story - Obedient disciple

प्राचीन वैदिक युग की गुरूकुल परम्परा में 'महिर्षि आयोदधौम्य' के आश्रम में अनेक शिष्य अध्ययन करते थे। गुरू के प्रति श्रद्धा, विद्याभ्यास में तत्परता तथा ब्रह्मचर्यपूर्वक कर्तव्यनिष्ठा के सांचे में ढले हुए उन छात्रों के लिए गुरूवर धौम्य की आज्ञा ही वेदवाक्य थी। प्रातःकाल यज्ञादि के लिए कुश लाना, बस्ती में जाकर मिक्षाटन करना, आश्रम पर गायों की रखवाली करना, उनका नित्य कर्म था। वर्षा ऋतु आ गयी थी। एक दिन तेज वर्षा के कारण गुरूजी के खेत की मेढ़ टूट गई। यदि पानी का बहाव न रोका गया तो खेती नष्ट होने की आशंका थी। गुरू की चिंता देख उनके 'शिष्य आरूणि' ने गुरू की आज्ञा ली और मेंढ़ ठीक करने में जुट गया। अचानक वर्षा का वेग तेज हो गया। मिट्टी और पत्थर लगाकर जितनी मेंढ़ आरूणि ने बना दी थी, उसके भी टूटने का खतरा था। दिन दल चुका था। ठण्ड बढ़ रही थी। वर्षा रूकने का नाम नहीं ले रही थी पानी के बहाव को रोकने का कोई उपाय न देख आरूणि खुद ही खेत की मेंढ़ बनकर लेट गया। खेत में पानी आना बन्द हो गया, लेकिन ठण्ड और वर्षा के पानी के कारण आरूणि ठिदुर कर मूर्छित होकर पड़ा रहा। रात बीती, दूसरा दिन उगा। अध्ययन-वेला में आरूणि को न  देख गुरूवर चिन्तित हो गए। आरूणि को खोजते हुए मेंढ़ पर गए तो आरूणि को मूर्छित अवस्था में मेंढ़ पर लेटे देखा। उसे उठाकर आश्रम में लाए और उसका उपचार किया। आरूणि को जब होश आया तो गुरूजी ने बरसती आँखों से उस पर स्नेह की वर्षा की और दोनों हाथों से उठा हृदय से लगा लिया। आरूणि यह स्नेह पाकर धन्य हो गया। गद-गद कण्ठ से उसे आशीर्वाद देते हुए गुरू धौम्य ने कहा- 'बेटा आरूणि। तुम श्रद्धा और कर्तव्य निष्ठा के मूर्तरूप बन गए हो। अब तुम्हें सुपात्र मानकर सारी विद्याएँ स्वतः ही प्राप्त हो जाएँगी। गुरूदेव का आशीर्वाद फलीभूत हुआ और बिना अध्ययन के ही आरूणि वेद-वेदांग और समस्त विद्याओं के पारंगत विद्वान बन गए। उनके व्यक्तित्व में श्रद्धा, तत्परता और इन्द्रिय निग्रह की त्रिवेणी साकार थी, जो प्राचीन गुरूकुल परम्परा का आधार थी।


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