नगर में एक प्रसिद्ध नेता का भाषण हुआ। एक युवक ने भी उस भाषण को सुना। वह इतना अभिभूत हुआ इस भाषण को सुनकर की वह सोचने लगा-"क्या में भी ऐसा भाषण कर पाउँगा कभी?" उसका नाम था डीमास्थनीज।
कठिनाई यह थी कि वह तुतलाता था, हकलाता था। डीमास्थनीज ने अच्छा वक्ता बनने की इच्छा के पीछे दृढ संकल्प खड़ा कर दिया। यहएकांत में समुद्र के किनारे चला गया। सागर की लहरों को संबोधित कर
वह बोलने लगा। उसे न तो वहाँ कोई भय था और न ही हिचकिचाहट। पर हकलाहट कैसे दूर हो?
उसने नियमित और अलग-अलग तरीकों से बोलने का निरंतर अभ्यास किया। एक तरीका काम न आया तो दूसरा, वह काम न आया तो तीसरा, पर वह लगन से अपने काम में लगा रहा।
निश्चय पक्का हो, जी-जान से प्रयास किया जाए तो मनुष्य क्या नहीं कर सकता है? डीमास्थनीज एक दिन प्रभावशाली भाषण करने वाले के रूप में विख्यात हो गया।
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