जीवन के प्रत्येक पहलु बचपन से लेकर पचपन तक हमे सीखने की आवश्यता होती है जैसे चलना, बोलना, गाना, साइकिल चलाना, विशेष खेल या जीवन यापन के लिए कोई काम आदि। वही पढ़ना भी एक कला है, शिक्षक सभी शिक्षाथियों को समान रूप से कक्षा, भाषण, मार्गदर्शन करता है परन्तु विद्यार्थी के परिणाम में अन्तर रहता ही है।
एक शिशु जब जन्म लेता है तो सर्वप्रथम कानों से संसारिक
आवाज सुनता है और आंखे खोलता है। आंखे खोलते ही वह देखता है कि मैं किस वातावरण
में हू और फिर रोना प्रराम्भ करता है ठीक इसी प्रकार एक विद्यार्थी को सबसे अधिक
शिशु की तरह सुनना, समझना, और बोलने के क्रम का
पालन करना चाहिए। यदि विद्यार्थी शत्-प्रतिशत सुनता है तों उसमें से केवल वही समझ
में आता है जिसकी आवश्कता आपको पूर्व में थी और उसी विषय के प्रति अधिक रूचिकर
होकर बोलना प्रराम्भ करते है।
आप
सभी जानते है कि बरसात में गढ्ढे पहले भरते है ठीक उसी प्रकार एक विद्यार्थी को
विषय के प्रति जिज्ञासु अर्थात् जानने की इच्छा रखने वाला होना होगा जिससे शिक्षक
द्वारा बताई गयी बातें सीधे-सीधे उसके मस्तष्क पटल पर छप जायें। विद्यार्थी को
अपने वातावरण में हो रही घटनाओं के बारे
में, ये घटनाऐ कब होती है? कैसे होती है? क्यों होती है? किसलिये होती है? कौन करता है? यह क्या है? आदि प्रश्न जानने की
इच्छा होगी तो संसार में आपको इसका जानने का स्त्रोत अवश्य मिलेगा और जब भी बिषय
सम्बन्धी जानकारी आप सुनते है तो सुनने के बाद आपको शत्-प्रतिशत समक्ष में आता है।
जिज्ञासावस बोलना प्रराम्भ करते है।
''‘ऐसा छात्र जो प्रश्न पुछता है वह पांच मिनिट के लिए मुर्ख रहता है लेकिन जो प्रश्न नहीं पुछता वह जिन्दगी भर मुर्ख रहता है’''
